प्रवीण कुमार झा कथेतर रुचि के लेखक हैं। गिरमिटिया इतिहास पर उनकी शोधपरक पुस्तक ‘कुली लाइंस’ चर्चित रही। संगीत इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ को कलिंग लिट्रेचर फ़ेस्टिवल 2021 ने ‘बुक ऑफ द यर’ से सम्मानित किया। उन्होंने इतिहास पुस्तकों के अतिरिक्त लघु यात्रा-संस्मरण भी लिखे हैं और उनके स्तंभ प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। प्रवीण का जन्म बिहार में हुआ और वह भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों से गुजरते हुए अमेरिका और यूरोप में रहे। वह सम्प्रति नॉर्वे में विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।
पुरुषों के पढ़ने का तर्क मेरी नज़र में तो यही है कि किताबों के अंबार लगाने वाले पुरुषों की भी स्त्रीवाद पर कितनी समझ है? यह तो ऐसा क्षेत्र है जहाँ शंकराचार्य से सिगमंड फ्रायड तक उलझ गए।
ओल्गा मात्र स्थान नहीं बदलती, समय में भी उड़ान लेती रहती है। वह कई सदी पीछे पहुँच कर एक अश्वेत के वंशज रूप में ऑस्ट्रिया के महाराज को चिट्ठी लिखती है। कभी वह संगीतकार शॉपिन की आखिरी इच्छा पूरी होते देख रही होती है, जब उन्होंने कहा था कि मरने के बाद उनके हृदय को उनके जन्मस्थान में दफ़नाया जाए।
ख़ुशहाली क्या वाक़ई परिभाषित की जा सकती है या यह सब बस एक तिलिस्म है? स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समरसता की बहाली क्या कोई लोकतांत्रिक सरकार करने में सक्षम हो सकती है? क्या मीडिया स्वतंत्र हो सकती है? क्या अमीरी-ग़रीबी के भेद वाक़ई मिट सकते हैं? क्या मुमकिन है और क्या नहीं? और अगर मुमकिन है तो आख़िर कैसे?
किंडल पर पुस्तक प्रकाशित करना बहुत ही आसान है। लेकिन किंडल पर किताबों की भीड़ में अपनी किताब को अलग और बेहतर दिखाना सीख लेना चाहिए। इस लेख में अमेजन किंडल पर पुस्तक प्रकाशित करने की प्रक्रिया
उन्हें यह भी समझ आ गया था कि अधिकतर श्रोताओं को संगीत की रत्ती भर समझ नहीं। कुछ अभिजात्य परिवार से यूँ ही सज-धज कर आगे की कुर्सियों पर बैठे हैं, कुछ शौक से आए हैं, कुछ यूँ ही पकड़ कर लाए गए हैं, और कुछ बस आ गए।