जब भारतीयों को बुलाया राम्मी-साम्मी

Rammy Sammy Gandhi Poster
दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के लिए तरह-तरह के अपमानजनक विशेषण प्रयोग किए जाते। जैसे कुली। जैसे रामास्वामी से उपजा विशेषण राम्मी-साम्मी। भारतीय इसके आदी हो चुके थे, मगर पच्चीस वर्ष के युवक गांधी ने इसका विरोध करना उचित समझा। पढ़ें वह चिट्ठी

डर्बन, अक्तूबर 25, 1894

संपादक महोदय,
टाइम्स ऑफ नटाल

मैं आपके अखबार में छपे लेख ‘राम्मीसाम्मी’ की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ।

आपके द्वारा ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से उद्धरण पर मुझे टिप्पणी की इच्छा नहीं, लेकिन यह ‘राम्मीसाम्मी’ शीर्षक क्या भारतीयों का अपमान नहीं? एक तरफ तो आप भारतीय संस्कृति को ऊँचा दर्जा देते हैं, और दूसरी ओर भारतीयों को गोरों के समान सम्मान नहीं देते। आप अगर उन्हें जंगली और निम्न संस्कृति का मानते, और अधिकार नहीं देते, तो यह बात समझी जा सकती थी। लेकिन आप भारतीयों को बुद्धिमान भी मानते हैं, और बेइज्जत भी करते हैं।

आप यह भी लिखते हैं कि अफ्रीका में आए भारतीय भारत में रह रहे भारतीयों से भिन्न हैं। आप यह भूल रहे हैं कि यह सब उसी मिट्टी की संतान हैं, और उसी संस्कृति की उपज हैं। क्या इंग्लैंड से बाहर रह रहा ब्रिटिश वहाँ का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता? आप अफ़्रीका में रहते हैं तो आपकी इंग्लैंड में इज्जत नहीं होती?

आप यह सीधे तौर पर मान क्यों नहीं लेते कि उन्हें यह अधिकार इसलिए नहीं कि उनका रंग गोरा नहीं, काला है। क्या यही आपका ईसाई धर्म कहता है कि हर रंग के लोग भिन्न हैं? यह ईसाईयत नहीं है।

और-तो-और आप ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का विरोध इसलिए करते हैं कि वह भारत में छपता है।

आप यह लिख कर लेख अंत करते हैं कि इन ‘राम्मीसाम्मी’ को सभी अधिकार मिल सकते हैं, लेकिन मताधिकार नहीं। क्या यह लेख ब्रिटिश नियम और ईसाई धर्मानुसार है? आपके ईश्वर ने कहा है, ‘मासूम बच्चों को शरण में आने दो’ वहाँ ‘मासूम’ से पहले ‘गोरा’ तो नहीं लिखा। डर्बन के मेयर ने बच्चों का जुलूस निकाला, जिसमें एक भी अश्वेत बच्चा नहीं था। क्या ये मासूम बच्चे अश्वेत होने की सजा भुगत रहे हैं? क्या यह आपके ‘राम्मीसाम्मी’ के लिए नफरत नहीं?

महोदय! मेरा एक सुझाव है। आप ‘न्यू टेस्टामेंट’ का पुन: पाठ करें। यह पढ़ें कि बाइबल क्या कहता है। क्या वह रंगों में भेद की बात कहता है? कोई ब्रिटिश कानून ही ऐसा कहता है? आप अगर यह स्वीकार लें कि आपने धर्म और राष्ट्र त्याग दिया, तो मैं यह चिट्ठी वापस ले लूँगा। यह दु:ख जरूर होगा कि फिर आपके अखबार को पढ़ने वाले इतने लोग क्यों हैं।

– मोहनदास करमचंद गांधी

Author Praveen Jha translates a letter of Gandhi to Times of Natal objecting to their news heading Rammy Sammy for Indians.

पढ़ें वह चिट्ठी जब गांधी को कचहरी में पगड़ी उतारने कहा गया। यहाँ क्लिक करें।

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