पहली चिट्ठी
प्रिटोरिया. 16 सितंबर 1893
सेवा में,
संपादक महोदय,
नटाल एडवायज़र
मुझे पता लगा कि आपके अखबार ट्रांसवाल ऐडवरटाइज़र में मि. पिल्लई की चिट्ठी पर खबर छपी है। दरअसल वह चिट्ठी लिखने वाला डर्बन का बदनसीब बैरिस्टर मैं ही था, जो अब प्रिटोरिया आ गया। पर मेरा नाम न मि. पिल्लई है, और न मैं बैचलर ऑफ़ आर्ट्स हूँ।
आपका
मोहनदास करमचंद गांधी
दूसरी चिट्ठी
19 सितंबर, 1893
आपके अखबारों ने जो मि. पिल्लई के शिकायत की दुर्दशा की है, उस पर ध्यान दिलाना चाहूँगा। भारतीयों को ”कमीने एशियाई व्यापारी”, “समाज का नासूर”, “परजीवी जो लगभग राक्षसी जीवन जीते हैं”, कहा गया है। हालांकि यह आपकी भाषा शैली होगी, और मुझे किसी की शैली के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार नहीं।
लेकिन एशियाई व्यापारियों से इतनी घृणा क्यों? (आपके लिए) यह देखना कितना कठिन है कि यह उपनिवेश बरबाद होता जा रहा है? अब आपके अखबार में मैंने पढ़ा कि, ‘एक एशियाई व्यापारी जब कंगाल हुआ, तो उसने पाउंड उधार के बदले बस पांच डाइम लौटाए। यही इन एशियाइयों की फितरत है, और ये छोटे यूरोपीय व्यापारियों की जगह लेते जा रहे हैं’
चलिए, मान लिया कि सभी एशियाई दिवालिया होते रहते हैं (जो सच नहीं), तो भी क्या उन्हें अफ्रीका से निकाल बाहर करना चाहिए? क्या यहाँ के दिवालिया कानून में बदलाव की जरूरत नहीं? यही कानून यूरोपीय व्यापारियों को छूट देता है, लेकिन एशियाई को नहीं। हालांकि, मैं एशियाई लोगों के दिवालिया होने की वकालत नहीं कर रहा। बल्कि, अगर वो किसी साहूकार का धन नहीं लौटाते, तो वो अपने देश का ही नाम खराब करते हैं। उस देश का, जो ईमानदारी के लिए विख्यात रहा है। लेकिन यह ज़रूर चाहूँगा कि गर गलती से कोई दिवालिया हो गया, तो उस पर वही कानून लागू हो जो यूरोपीय व्यापारी पर लागू है।
आपके अखबार के अनुसार भारतीय छोटे यूरोपीय व्यापारियों को भगा रहे हैं। यह ध्यान रखें कि यूरोपीय और भारतीय व्यापारियों के बीच मधुर संबंध होंगें, तभी तो उधार देते होंगें। इसलिए आप जो तस्वीर दिखा रहे हैं, वो दरअसल सच नहीं।
अगर यूरोपीय व्यापारियों की जगह भारतीयों ने ले ली, तो क्या उन्हें थाल में सजा कर जगह वापस दी जाए? यह तो स्पष्ट ही है कि भारतीय व्यापारी अधिक काबिल निकले। काबिल के साथ तो अच्छा व्यवहार करना चाहिए। अगर आपका अखबार अच्छा संपादन कर किसी और अखबार को बाजार से बाहर कर दे, तो क्या आपसे आपका अखबार छीन कर वापस उसे दे देना चाहिए? फिर कोई ऊपर उठना या अच्छा करना ही क्यों चाहेगा?
क्या आपका न्याय व्यापार से प्रतियोगिता खत्म करना है? मैं तो कहूँगा कि यूरोपीय व्यापारियों को भारतीयों से सस्ते में सामान बेचना और कम पैसे में जीवन गुजारना सीखना चाहिए। गर वो यह सीख लें, तो शायद भारतीयों से न्याय-पूर्वक आगे बढ़ जाएँ।
आपका अखबार यह भी लिखता है कि भारतीय असभ्य और जंगली हैं। आपसे यह जानना रोचक होगा कि आपके ‘असभ्य’ की परिभाषा क्या है, क्योंकि हिंदुस्तान की कुछ जानकारी मुझे भी है।
अगर कमरे में खूबसूरत कालीन का न बिछा होना, एक डिनर-टेबल और उस पर मंहगी सजावट का न होना, वहाँ सूअर और गोमांस का न होना, शराब का न होना, असभ्यता है। अगर गरम देश में पतला सफेद धोती-कुर्ता पहनना असभ्यता है। अगर बीयर न पीना, सिगरेट न पीना, हाथ में सुनहरी घड़ी पहन छड़ी लेकर न चलना, और एक आलीशान ड्राईंग रूम न होना असभ्यता है। अगर एक साधारण सात्विक जीवन जीना असभ्यता है, तो आपका इल्जाम ठीक है। आपकी परिभाषा में भारतीय असभ्य है। जितनी जल्दी आपके महान् उपनिवेशों से यह परिभाषा खत्म हो जाए, वही अच्छा होगा।
सच तो यह है कि ऐसा कोई भी ठोस कारण नहीं, जिस वजह से भारतीयों को इस देश से निकाला जाए। वे तो किसी भी राजनैतिक मुद्दे में दखल भी नहीं देते। उनमें कोई भी नामी लुटेरा नहीं। आज तक एक भी भारतीय व्यापारी को जेल भी नहीं हुई। किसी पर चोरी, डकैती या गबन का आरोप न लगा। ये शाकाहारी लोग, जो शराब भी नहीं छूते, वो क्या दुष्कर्म करेंगें?
आपका अखबार यह भी लिखता है कि हिंदुस्तानी कुछ खर्च नहीं करते। सच में? मुझे लगता है कि वो बस हवा और भावनाओं पर जीते हैं। ‘वैनिटी फेयर’ उपन्यास में बेकी (Becky) एक वर्ष बिना एक पैसा खर्च किए जीती है। यहाँ तो पूरा एक समुदाय है। जो न किराया देती है, न टैक्स, न कोई बिल, न वेतन। आज के इस कठिन युग में भला कौन ऐसा व्यापारी न बनना चाहेगा?
यह स्पष्ट है कि भारतीयों का शांतिपूर्ण रहना, नशा न करना, और सात्विक जीवन जीना, जो उनकी अच्छाई है, आज उनसे ईर्ष्या और घृणा का कारण बन गई। और ये ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं। क्या यही ईसाई धर्म का इंसाफ है, न्याय है? क्या यही आपकी संस्कृति है? मैं उत्तर का इंतजार करूँगा।
मैं यह उम्मीद करता हूँ कि मेरी बात आप अखबार में डालेंगें।
आपका
मोहनदास करमचंद गांधी
तीसरी चिट्ठी
आपके अखबार में ‘एशियाई-विरोधी’ बातों के जवाब में लिखने के लिए अखबार में जगह कम होगी, लेकिन मेरी दो बातों के विरोध को कृपया जगह दें। एक तो यह आशंका कि कुली वोट यूरोपीय वोटों पर भारी पड़ेगी, और दूसरी कि कुली को वोट देने के लिए अयोग्य कहना।
मैं पहले यह कहूँगा कि अपने महान् ब्रिटिश राज्य की बुद्धि का ही उपयोग करें। अगर आप एकतरफा लिखेंगें, तो पाठकों के लिये यह न्याय नहीं होगा। आपको निष्पक्ष ही लिखना चाहिए।
क्या आपको सचमुच लगता है कि भारतीय वोट यूरोपीय वोटों पर भारी पड़ेंगें? यह असंभव है। आज भी यूरोपीय समृद्धि के सामने भारतीयों की संख्या कमजोर ही नजर आती है।
भारतीय दो वर्गों में बंटे हैं- व्यापारी और मजदूर। मजदूर अधिक हैं, लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं। वो गरीब हैं, और उनकी इतनी संपत्ति नहीं कि वोट देने की योग्यता पा सकें। और ये मजदूर ही यहाँ के असल बाशिंदे हैं।
व्यापारी तो जगह बदलते रहते हैं। जिनके पास धन है, उन्हें वोट देने में खास रूचि भी नहीं। भारतीयों को भारत में भी वोट देने की या अपने अधिकारों को समझने की रूचि कम है। वो भक्ति में इतने लीन होते हैं कि राजनीति की फुरसत कहाँ? वो बस ईमान से जीना चाहते हैं और दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं। राजनीति में कम ही लोग जाना चाहते हैं। तो आपका यह डर कि हिंदुस्तानी राजनीति में आपको हरा देंगे, निराधार नजर आता है।
जो कुछ वोट भारतीयों के पास हैं भी, उससे नटाल राजनीति पर फर्क नहीं पड़ेगा। आपका भारतीय पार्टियों और भारतीय नेताओं से डर बेकार है, गर चुनना दो गोरे लोगों के बीच ही है। क्या फर्क पड़ता है कि हिंदुस्तानी ने किस गोरे को वोट दिया? अधिक से अधिक वो गोरों में अच्छा गोरा चुन सकते हैं, जो शायद अच्छा काम भी करे। गर एक-दो भारतीयों ने पार्टी बना भी ली, और जीत भी गए, तो आपकी संसद में उनका कितना महत्व होगा? अधिक से अधिक वो गवर्नर साहब से एक-दो सवाल पूछ लेंगें, और अगले दिन अखबार में एक खबर आ जाएगी।
आप यह भी कहते हैं कि भारतीय वोट देने के लायक नहीं, क्योंकि वो अफ्रीकियों के बराबर ही असभ्य हैं। पता नहीं, आपकी सभ्यता की परिभाषा क्या है? मैं जानना भी नहीं चाहता। बस यह कहूँगा कि भारत में भी उनके यह अधिकार तो हैं ही। मैग्ना कार्टा 1858 में यह स्पष्ट ही लिखा है। आपको यह भी बता दूँ कि आपकी नजर में एक असभ्य भारतीय कलकत्ता के मुख्य न्यायाधीश हैं, एक अलाहाबाद के, और एक ब्रिटिश सांसद भी हैं। इतना ही नहीं, ब्रिटिश संसद जिस अकबर बादशाह का आदर करती रही है, वो भारतीय ही थे। आपकी भू-राजस्व नीति भारत के टोडरमल की नीति पर ही आधारित है। अगर यह सभ्यता नहीं है, तो मुझे लगता है पढ़ाई ठीक से करनी होगी कि सभ्यता आखिर है क्या?
अगर आप यह चिट्ठी पढ़ कर भी यूरोपियों द्वारा भारतीयों के विरोध को सही मानते हैं, तो आप वाकई महान हैं।
– मोहनदास करमचंद गांधी
Author Praveen Jha translates some early letters of Mohandas K Gandhi when he was shoved down from footpath in Durban.
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