वकालत की अर्जी, जो रिजेक्ट हुई

Gandhi Bombay Application
गांधी के लिए लंदन से बैरिस्टर होना नौकरी के लिए काफ़ी नहीं था। उन दिनों बंबई में ऐसे बैरिस्टरों की कमी नहीं थी। जाति से बहिष्कृत और पैसों से तंग गांधी की कुछ चिट्ठियाँ यहाँ पढ़ी जा सकती है।

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वकालत की दरख्वास्त

बंबई, नवंबर 6, 1891

सेवा में,

रजिस्ट्रार,

हाई कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर,

बॉम्बे

महोदय,

मेरी उच्च न्यायालय में वकालत की इच्छा है। मैं लंदन की बार में इस जून को बुलाया गया। मैनें ‘इनर टेम्पल’ में बारह सत्र बिताए हैं और मेरी इच्छा बॉम्बे में वकालत की है।

मैं बार में प्रवेश का प्रमाणपत्र संलग्न कर रहा हूँ। मेरे चरित्र या कौशल का कोई भी प्रमाणपत्र मुझे लंदन के न्यायाधीश से नहीं मिल सका, और मुझे बॉम्बे के नियमों का ज्ञान नहीं। लेकिन मैं सुप्रीम कोर्ट, इंग्लैंड के बैरिस्टर श्री एडवर्ड्स का लिखा प्रमाण-पत्र लगा रहा हूँ। उन्होनें बार के लिए किताब भी लिखी है ‘द कम्पेन्डियम ऑफ लॉ ऑफ प्रॉपर्टी इन लैंड’।

आपका आज्ञाकारी

मोहनदास करमचंद गांधी

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एक वर्ष के संघर्ष के बाद मित्र रणछोड़लाल पटवारी को चिट्ठी

बंबई, 5 सितंबर 1892

प्रिय पटवारी,

तुम्हारी चिट्ठी और सलाह के लिए शुक्रिया।

जैसा मैनें तुम्हें पहले बताया था कि मेरे लिए विदेश जाकर वकालत करना अभी शायद मुमकिन न हो। मेरे भैया ने मुझे कहा है कि काठियावार में बिना किसी खटपट के मेरा जीवन अच्छा बीतेगा। अब भैया ने मेरे लिये इतना कुछ किया है, तो उनकी सुननी ही होगी। बंबई में भी कुछ अवसर मिले हैं, तो दो महीने यहीं रहूँगा।  हालांकि वह कुछ साहित्यिक कार्य है, पर कानूनी काम मिल ही कहाँ रहा है? काम मिलना इतना आसान कहाँ?

मैनें तुमसे कुछ उधार मांगा था, तो तुमने कहा कि तुम्हारे पिताजी को न बताऊँ। यह झूठ तो मैं नहीं बोल पाऊँगा, इसलिए अब रहने दो। तुमने भी आखिर एक साल की वकालत में कितना बचा लिया होगा?

मेरे भैया को सचिन के नवाब के यहाँ नौकरी मिल गई है। 

जात-भाईयों का विरोध तो चल ही रहा है। एक व्यक्ति है जिसने मेरा जाति-बहिष्कार कर दिया है। मुझे अपनी चिंता नहीं, पर अपने परिजनों की हैं जो किसी व्यक्ति की बात भेड़-बकरियों की तरह मान रहे हैं। और वो बस जाति की सोचते हैं, धर्म की नहीं। यह अच्छा ही हुआ कि मैं लंदन से लौट कर जाति से बहिष्कृत हुआ। अब मैं मुक्त होकर अपनी राह चलूँगा।

व्रजलभाई कारभारी बन गए, यह जान कर खुशी हुई।

मित्र! तुम इतना अच्छा लिखते हो कि मैं भी तुम्हारी नकल कर कभी अच्छा लिखना चाहता हूँ।

– तुम्हारा मोहनदास

जब गांधी के विषय में अखबार में छपा- द अनवेलकम विजिटर। वह खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें 

Author Praveen Jha translates some early letters of Mohandas K Gandhi during his career struggle years in Bombay.

प्रवीण झा की किताबों के लिए क्लिक करें

 

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