प्रवीण कुमार झा कथेतर रुचि के लेखक हैं। गिरमिटिया इतिहास पर उनकी शोधपरक पुस्तक ‘कुली लाइंस’ चर्चित रही। संगीत इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ को कलिंग लिट्रेचर फ़ेस्टिवल 2021 ने ‘बुक ऑफ द यर’ से सम्मानित किया। उन्होंने इतिहास पुस्तकों के अतिरिक्त लघु यात्रा-संस्मरण भी लिखे हैं और उनके स्तंभ प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। प्रवीण का जन्म बिहार में हुआ और वह भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों से गुजरते हुए अमेरिका और यूरोप में रहे। वह सम्प्रति नॉर्वे में विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।
लद्दाख में देवी तारा का बहुत महत्व है। यह बौद्ध धर्म के तांत्रिक रूप का अंग है। इसकी खोज में एक स्याह पक्ष का पता लगा। स्मगलिंग। लद्दाख यात्रा पर खंड में उन्हीं पर चर्चा
लद्दाख में बौद्ध और इस्लाम दोनों का अनुपात लगभग बराबर है। सांस्कृतिक रूप से यह बौद्ध बहुल क्षेत्र रहा है। लद्दाख के बौद्ध धर्म पर एक आम यात्री को फौरी समझ ही मिल सकती है। इस खंड में उसी की चर्चा
लद्दाख दुनिया के सबसे चरम जलवायु वाले प्रदेशों में है। यहाँ के विषय में यह बात कि यहाँ घास भी नहीं उगती, कितनी सच है? लद्दाख यात्रा के साथ-साथ बतकही कई राज खोलती है
गांधी के यात्रा वृतान्त कम लोकप्रिय रहे। मगर उसे वह बहुत विनोद और सरलता से लिखते थे। बाइस वर्ष के विद्यार्थी गांधी जब लंदन से जहाज पर लौटे तो उस अनुभव को कुछ यूँ दर्ज़ किया
1888 ई. में उन्नीस वर्ष के मोहनदास लंदन पहुँच तो गए पर उन्हें लग गया कि लंदन के लायक उनके पास धन नहीं, तो छात्रवृत्ति की अर्जी देनी शुरू की। हालांकि यह छात्रवृत्ति उन्हें मिली नहीं।
एशिया के सबसे स्वच्छ गाँव मेघालय में है। उस गाँव की सैर के साथ उत्तर-पूर्व की राजनीति को समझने की कोशिश हुई। ख़ास कर यह कि एक ईसाई बहुल या हिंदू अल्पसंख्यक राज्य में भाजपा किस तरह आगे बढ़ रही है।
मेघालय उत्तर-पूर्व की बादलों से घिरी घाटियों में बसा ईसाई बहुल राज्य है। उसकी यात्रा एक पर्यटक की भाँति भी की जा सकती है। सांस्कृतिक भी। यूँ ही बतकही करते भी। इस यात्रा के पहले खंड में मेघालय के कुछ भूले-बिसरे पत्थरों की बातें
महात्मा गांधी पहले विद्यार्थी मोहनदास थे। बाइस वर्ष की उम्र में एक विद्यार्थी का दिया साक्षात्कार अपने आप में अनूठा है। इसमें गांधी का अपरिपक्व रूप भी है, और परिपक्वता की झलक भी
दिल्ली में किसानों को लेकर जाना महेंद्र सिंह टिकैत का चरम बिंदु था। वहाँ राजनीति के संपर्क में आना उनके लिए कुछ हानिकारक भी रहा। लेकिन, वह दिन भी आया जब महेंद्र सिंह टिकैत का विरोध पेरिस पहुँचा। इस आखिरी खंड में उन घटनाओं पर बात