प्रवीण कुमार झा कथेतर रुचि के लेखक हैं। गिरमिटिया इतिहास पर उनकी शोधपरक पुस्तक ‘कुली लाइंस’ चर्चित रही। संगीत इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ को कलिंग लिट्रेचर फ़ेस्टिवल 2021 ने ‘बुक ऑफ द यर’ से सम्मानित किया। उन्होंने इतिहास पुस्तकों के अतिरिक्त लघु यात्रा-संस्मरण भी लिखे हैं और उनके स्तंभ प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। प्रवीण का जन्म बिहार में हुआ और वह भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों से गुजरते हुए अमेरिका और यूरोप में रहे। वह सम्प्रति नॉर्वे में विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।
हिंदुस्तानी संगीत है तो घराने हैं। घराने हैं, तो कथाएँ हैं। कथाएँ हैं, तो उनमें रस है। उतना ही, जितना कि संगीत में। क्योंकि कथाएँ बनी ही संगीत से है। मुश्किल ये है कि यह कोई बताता नहीं
एक श्रोता के लिए राग पहचानने के फेर में अधिक पड़ना आवश्यक नहीं। गायक-वादक यूँ भी राग और ताल पहले बता देते हैं। सी.डी. या यू-ट्यूब पर भी यह लिखा ही होता है, तो यह कोई छुपा रहस्य नहीं कि इसे जानना ही हो। लेकिन रागों की समझ हो तो आनंद बढ़ने लगता है
मुझे किसी ने पूछा कि किन्हीं पाँच स्वरों को मिला कर क्या राग बन जाएगा? यूँ गणित से राग नहीं बनता। जैसे किसी भी चार अक्षर मिला कर शब्द नहीं बनाया जा सकता। उस शब्द का कोई अर्थ तो हो कि शब्द बोलते ही एक ख़ास चीज ध्यान आए। ‘अमरूद’ कहें तो एक फल ध्यान आए
मैं अमरीका में अलझाइमर पर शोध से जुड़ा था। उस समय मुझे एक शोध-पत्र मिला कि अलझाइमर के मरीज जिनकी स्मृति क्षीण हो चुकी है, वह गीत की धुन या पहली पंक्ति सुन कर अगली पंक्ति गुनगुनाने लगते हैं। बाद में यह मैंने मरीजों में देखा भी कि अखबार पढ़ने की क्षमता खत्म हो गयी, लेकिन संगीत का आनंद ले रहे हैं।
एक विश्वविद्यालय आयोजन याद आता है। किनकी प्रस्तुति थी, यह नहीं कहूँगा लेकिन दर्शकों में कॉलेज़ के लड़के बैठे थे। बमुश्किल पांच मिनट में पीछे से खिसक कर भागने लगे, तो दरवाजे पूरी तरह खुलवा ही दिए गए। जब गायक बंदिश पर आए, कई उसी दरवाजे से आकर बैठने भी लगे, और आखिर अच्छी-खासी युवाओं की भीड़ आ ही गयी
भैरवि (या भैरवी) को सदा सुहागन रागिनी तो कहते ही हैं, लेकिन इसका विस्तार इन उपमाओं से परे है। शायद ही कोई संगीत कार्यक्रम हो, जिसका अंत भैरवि से न होता हो। और शायद ही कोई सुबह हो, जब दुनिया के किसी एक कोने में भैरवि न गाया या सुना जा रहा हो।
शिव के लिए महेशवाणी और नचारी दो तरह के गीत गाने की रीति रही है। कालांतर में दोनों में भेद करना कठिन हो गया है। एक आम समझ के हिसाब से महेशवाणी और नचारी के मध्य अंतर पर बात
जब अलादिया ख़ान साहब की आवाज लंबे समय तक अमलेता में तान खींचते हुए चली गयी, तो वह कहीं के नहीं रहे। ऐसे समय में उन्होंने यही तकनीक सोची कि वह राग गाओ जो कोई न गाता हो
एक दफे सचिन देव बर्मन किशोर दा के घर पहुँचे तो वह बाथरूम में थे और नहाते हुए के.एल. सहगल की कॉपी करते बीच में योडल कर रहे थे। जब वो बाहर निकले तो एस.डी. बर्मन ने कहा कि किशोर! तुम ये नकल छोड़ दो, गला तोड़ दो, फिर निकलेगी किशोर कुमार की आवाज!