प्रवीण कुमार झा कथेतर रुचि के लेखक हैं। गिरमिटिया इतिहास पर उनकी शोधपरक पुस्तक ‘कुली लाइंस’ चर्चित रही। संगीत इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ को कलिंग लिट्रेचर फ़ेस्टिवल 2021 ने ‘बुक ऑफ द यर’ से सम्मानित किया। उन्होंने इतिहास पुस्तकों के अतिरिक्त लघु यात्रा-संस्मरण भी लिखे हैं और उनके स्तंभ प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। प्रवीण का जन्म बिहार में हुआ और वह भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों से गुजरते हुए अमेरिका और यूरोप में रहे। वह सम्प्रति नॉर्वे में विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।
बैजू अपने बेटे को ढूँढने कश्मीर की ओर पदयात्रा पर निकले। वहीं रास्ते में होशियारपुर जिले के एक गाँव में वह ठहरे, जो उनके नाम पर ‘बजवाड़ा’ नाम से मशहूर हुआ
मैं विज्ञान से जुड़ा व्यक्ति हूं और यह कल्पना करता रहता हूं कि विश्व का ऐसा कौन-सा वाद्य-यंत्र होगा जो मनुष्य के ‘वोकल कॉर्ड’ (स्वर-रज्जु) के सबसे करीब होगा. जिसके तार छेड़े जाएं तो गायन के समानांतर हो
एक दिन बाबा मैहर के राजा साहब के पास बैठे थे। वह शिकार के लिए बंदूकों की नली साफ करवा रहे थे। कई बंदूकों में जंग लग गयी थी, उसे किनारे रखवा देते।
बाबा ने कहा, “महाराज! इन बंदूक की नलियों को आप मुझे दे दें।”
एक दिन वसंत राव देशपांडे जी के पास ले गए, तो उन्होंने कहा, “यह क्या कर रहे हो? हुनर कोई नुमाइश की चीज है कि बच्चा बढ़िया ढोल पीटता है? दो-चार लोगों ने वाह-वाह क्या कर दी, खुश हो गए? हुनर है तो उसे तराशो! दुनिया में भीड़ बहुत है, ऐसे हज़ारों बच्चे घूम रहे हैं। इसे बाक़ायदा तालीम दो, और यह नुमाइश बंद करो!”
“तुम्हें कहाँ गाना है? यह तो तुम्हारे अंदर बसा धारवाड़ गाएगा। बस अब्दुल करीम ख़ान साहब की एक बात ध्यान रखो कि जब मंच पर बैठोगे, तब तुम राजा हो। और जब मंच से उतरोगे तो निरीह। अपना अभिमान और अपनी असीम शक्ति मंच तक ही रहेगी।”
पंडित जी को मैंने करीब से देखा है, और उनके गायकी से पहले ही उनके चेहरे पर भाव आ जाते हैं। उनकी भृकुटी, उनकी आँखें, उनके होंठ, उनका गला सब भिन्न-भिन्न रसों के हिसाब से बदल जाते हैं
आप इसे इत्तेफाक ही कहेंगे लेकिन वाकई इसको दो बारी बजाते समय बारिश हुई और एक समय यह मैं जंगल के बीच खुले आसमान में बजा रहा था और द्रुत के समय बारिश होने लगी। यह अनुभव अलौकिक था, जैसे किसी वैज्ञानिक का प्रयोग सफल हो गया हो।