कहानी गौतम बुद्ध की

Gautam Buddha
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गौतम बुद्ध आज एक भगवान रूप में पूजे जाते हैं, लेकिन उनसे जुड़ा एक इतिहास भी है। यह संभव है कि वह मनुष्य रूप में इस धरती पर जन्मे थे, और मनुष्य रूप में ही रहे। बौद्ध विशेषज्ञ विश्वपाणी ब्लोमफील्ड अपनी पुस्तक में बुद्ध की ऐसी छवि रखते हैं, जिसे वैज्ञानिक दुनिया के लोग भी मान सकें। पढ़ें उनकी पुस्तक पर आधारित यह जीवनी

जिस वक्त मैं यह कहानी लिख रहा हूँ, मैं किसी यात्रा पर एक हवाई जहाज में बैठा हूँ, और बिहार में चुनाव हो रहे हैं। बिहार, जिसका नाम उपजा है ‘विहार’ से, और विहार की उपज होती है गौतम बुद्ध से। 

मेरे हाथ में विश्वपाणी ब्लोमफील्ड की लिखी एक पुस्तक है- ‘गौतम बुद्ध’, जो मैंने अभी-अभी पढ़ कर पूरी की है। इस जीवनी में बुद्ध भगवान नहीं, एक व्यक्ति हैं, जो कभी बिहार (वर्तमान नाम) में चल रहे थे, जैसे अन्य मनुष्य चलते हैं। जो उम्र होने पर मर गए, जैसे अन्य मनुष्य मरते हैं। इस पुस्तक को पढ़ कर ऐसा नहीं लगता कि इसे एक ऐसे व्यक्ति ने लिखा है, जिसने चौदह वर्ष की उम्र में ही बौद्ध धर्म स्वीकार लिया था। बल्कि शायद ऐसे व्यक्ति ने लिखा है जिसने बौद्ध धर्म अपना कर भी बुद्ध को भगवान नहीं माना। उन्हें ऐसा मनुष्य माना, जो अपने जीवनकाल में उस महानता तक पहुँचे, कि आज भी वेल्स (ब्रिटेन) का अमुक व्यक्ति किशोरावस्था में उनके अनुयायी बनने की ठान लेता है। 

उसी पुस्तक के माध्यम से समझते हैं— कौन थे गौतम बुद्ध? कैसे बने वह गौतम बुद्ध? क्या है बौद्ध धर्म की कहानी?

क्या किसी ने बुद्ध को साक्षात् देखा था?

श्रावस्ती की यह एक आम सुबह है। धोबी तालाब किनारे कपड़े धो रहे हैं। बाजार में कसाई मांस काट रहे हैं। ज्योतिषी के पास भविष्य जानने वालो की भीड़ लगी है। शराब की दुकान खुलते ही व्यस्त हो गयी है। कपड़े और गहनों की दुकानों पर भी इक्के-दुक्के लोग हैं।

इस चहल-पहल के बीच किसी दूर देश का व्यक्ति पेड़ों की छाल से बने वस्त्र पहने, नंगे पैर, श्रावस्ती की झोपड़ियों, बाजार और भवनों के मध्य गुजरते हुए किन्हीं को ढूँढ रहा है। बहिया नामक वह व्यक्ति भारत के पश्चिमी समुद्र तट से दिन-रात चलता हुआ आज उस नगर में पहुँचा है, जहाँ ऐसे व्यक्ति रहते हैं, जिनके पास संभवतः सभी प्रश्नों के उत्तर हैं। तभी उसकी नज़र एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति पर पड़ती है, जिन्होंने खुरदरे पीले वस्त्र पहन रखे हैं, जिसे कमर में बाँध कर ऊपर कंधों तक लपेट रखा है। उनके हाथ में एक पत्तों का बना पात्र है, और कमर में एक पोटली है। नगर के लोग उन्हें गौतम के नाम से जानते हैं।

बहिया उन्हें देखते ही उनके कदमों में झुक जाता है, ‘मुझे शिक्षा दें, गौतम! मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर दें’

‘मैं अभी भिक्षाटन पर हूँ। मुझसे बाद में आकर मिलें’, गौतम ने कहा

‘मैं प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मुझे मालूम नहीं कि मैं कब तक जीऊँगा, और आप कब तक जीएँगे’, बहिया ने अधीर होकर कहा

‘बहिया! तुम्हें स्वयं को इस तरह तैयार करना है। जो दिख रहा है, वह दृष्टि का अंश मात्र है। जो सुन रहे हो, वह श्रवण का अंश मात्र है। जो अनुभव कर रहे हो, वह अनुभव का अंश मात्र है। जो समझ रहे हो, वह समझ का अंश मात्र है…जब तुम नहीं रहोगे, जहाँ तुम हो। न यहाँ, न वहाँ, न इन दोनों के मध्य, वहीं तुम्हारी  पीड़ा का हल होगा’

बुद्ध ने स्वयं कभी कुछ नहीं लिखा (यह भी स्पष्ट नहीं कि वह लिख सकते थे)। ऐसे में बुद्ध की जानकारी उनको प्रत्यक्ष देखने वालो के सुनाए विवरणों से मिल सकता है। अधिकांश वर्णन बुद्ध के मरने के सदियों बाद लिखे गए। ‘बहिया सुत्त’ उन सीमित प्राथमिक स्रोतों में हैं, जो बुद्ध को आमने-सामने देख कर कहा गया। हालाँकि इसे भी बहिया ने स्वयं नहीं लिखा, बल्कि बुद्ध के चचेरे भाई आनंद ने अपनी स्मृति से सुनाया। वर्षों तक यह सुनाया ही जाता रहा, और पाली या संस्कृत में लिपिबद्ध बहुत बाद में हुआ। इसलिए यह कहना कठिन है कि हू-ब-हू ऐसा ही हुआ होगा।

पहला लिखित तथ्य कि बुद्ध रहे होंगे, वह अशोक के शिलालेखों में मिलता है। लेकिन वह भी बुद्ध के डेढ़ सौ वर्ष बाद का है। इसलिए बुद्ध की सच्ची कहानी कहना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन सदियों पुराने हजारों लिखित वर्णन और छवियाँ जो भिन्न-भिन्न देशों में पसरे हैं, वह कोरी कल्पना हो, यह भी अविश्वसनीय है। यह मान लेना ही उचित है कि गौतम, सिद्धार्थ, तथागत या बुद्ध नामों के एक व्यक्ति आज से ढाई हजार (से अधिक) वर्ष पूर्व रहे होंगे।

बुद्ध के जन्म को लेकर जब मैंने लद्दाख के बौद्ध मठ में परीकथा सी कहानी सुनी, तो उसे मन से मिथकीय ही माना। तुषिता स्वर्ग और बुद्ध के कई अवतार जैसी बातें आज के विज्ञान-प्रभावित समाज में सुपाच्य नहीं है। यदि बुद्ध को सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेते दिखाया जाए, तो उन पर विश्वास करना अधिक सहज होगा। विश्वपाणी ब्लोमफील्ड अपनी पुस्तक में कुछ ऐसा ही प्रयास करते हैं कि वर्णनों में से अतिशयोक्ति को किनारे करें, और संभव घटनाओं को सामने रखें। 

कैसे बीता बुद्ध का बचपन? 

नेपाल-भारत सीमा पर स्थित कपिलवस्तु आज कोई बड़ा नगर नहीं है। बुद्ध के समकालीन वर्णन में मात्र एक संवाद है जब उनके चचेरे भाई महानामा कहते हैं,

‘कपिलवस्तु में इतनी भीड़ है कि कब चलते-चलते हाथी, घोड़े, बैलगाड़ी से टकरा जाएँ, कहा नहीं जा सकता’

अगर ऐसा कोई व्यस्त नगर था, तो यह नगर फाह्यान और ह्वेनसांग के आते-आते खत्म हो चुका था। उनके वर्णनों में यहाँ कुछ भग्नावशेष ही बचे थे। शाक्य वंश की यह राजधानी कब और कैसे खत्म हुई, यह पुस्तक में आगे स्पष्ट है। लेकिन जब भग्नावशेष थे, तो नगर भी रहा होगा।

कपिलवस्तु किसी बड़े राज्य की राजधानी नहीं थी। उन दिनों कई जनपदों को मिला कर महाजनपद बनते थे। कोसल, वृज्जि (वैशाली), और मगध उत्तर भारत के मुख्य महाजनपदों में थे। यह गणराज्य व्यवस्था थी, जिसमें कई चुने गए गण होते, जिन्हें राजा भी संबोधित किया जाता। लेकिन ये पूरे महाजनपद के नहीं, बल्कि एक छोटे जनपद के सामंत होते। शुद्धोधन कोसल महाजनपद के कई गणों में एक गण थे। उन्हें शाक्य वंशियों ने अपने क्षेत्र में चयनित किया था। अर्थात् गौतम बुद्ध भी शब्दशः कोसल के राजकुमार न होकर वहाँ के एक सामंत-पुत्र कहे जा सकते हैं। 

शाक्यों के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कोलियों से विवाद होते रहते थे, और इसे घटाने के लिए उनमें वैवाहिक संबंध होते। गौतम की माँ माया इसी कोलिय समुदाय से थी। माया की मृत्यु गौतम की प्रसव-पीड़ा में या उसके बाद हो गयी, और उनकी बहन प्रजापति ने गौतम को पाला-पोसा (आनंद के वर्णन के अनुसार— दूध पिलाया)।

बुद्ध राजकुमार हों न हों, एक प्रभावशाली धनाढ्य परिवार से थे। जहाँ महंगे कपड़े बनारस से आते, चंदन लेप लगाए जाते। उनके अलग-अलग ऋतुओं के लिए घर भी थे। गर्मियों में पहाड़ों पर, और ठंड में मैदानी इलाकों में। भारत के धनी परिवारों में आज भी कुछ लोग हिल-स्टेशन में बंगला रखते हैं, तो इस तरह के आवासों की कल्पना की जा सकती है। 

सोलह-सत्रह वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। पत्नी का नाम आरंभिक वर्णनों में राहुलमाता (राहुल की माँ) है, जिस तरह के संबोधन आज भी बिहार-यूपी में प्रचलित हैं। बाद के वर्णनों में कई अन्य नाम जैसे यशोधरा, बद्धचच्चा, बिम्बा, गोपा, शुभदक्का, मिगजा उभरते हैं। उन दोनों के संबंध से राहुल का जन्म हुआ, लेकिन बुद्ध से लंबे वैवाहिक या प्रेम संबंध की संभावना नहीं दिखती। यह एक व्यवस्था-विवाह थी, और युवा बुद्ध का मन उस काल के अन्य युवाओं की तरह कहीं ओर केंद्रित दिखता है।

कपिलवस्तु में संन्यासी प्रवृति के कई श्रमणों का आना-जाना लगा रहता। वृज्जि गणराज्य में महावीर नामक एक व्यक्ति भी प्रभाव डालने लगे थे। मैं पढ़ते हुए यह सोचने लगा कि एक बिहार-यूपी (वर्तमान प्रांत नाम) के समृद्ध युवक के मन में उन दिनों कैसी हलचल हो रही होगी। वे भविष्य के लिए क्या सोच रहे होंगे? यदि सभी अलौकिक घटनाओं को किनारे कर दिया जाए, शाक्य-कुल के सिद्धार्थ गौतम, और उनके चचेरे भाइयों महानामा और आनंद के लिए दो विकल्प दिखते हैं। 

पहला कि गणराज्य के सामंत परिवार में अपना योगदान दें। दूसरा कि इन श्रमणों, इन अजीवकों, या किन्हीं महावीर की दिशा में खिंचे चले जाएँ, और अपना मार्ग स्वयं तलाशें।

एक प्रचलित किंवदंती है कि बुद्ध को उनके पिता ने समाज से दूर महल में रखा था, और उन्हें सांसारिक दुखों से परिचय नहीं था। पहली बार युवावस्था में जब वह महल के दरवाजे से निकले तो एक शवयात्रा दिखी, दूसरे में एक बीमार व्यक्ति दिखे, तीसरे में एक वृद्ध दिखे, और चौथे में एक तपस्वी (श्रमण) दिखे। विश्वपाणी ब्लोमफील्ड इसे एक मिथ्या मानते हैं, कि युवा बुद्ध को इनकी जानकारी ही नहीं होगी कि मनुष्य बूढ़े या बीमार होते हैं, और मर जाते हैं। वह इस कथा को किसी आरंभिक पाली या संस्कृत स्रोत में भी नहीं पाते। इनमें से मात्र श्रमण साक्षात्कार ही वर्णित है। उन दिनों ऐसे श्रमण घूमते रहते थे, जो सांसारिक मोह त्याग कर, बाल और नाखून बढ़ा कर भिक्षाटन करते रहते थे। उनका बुद्ध से मिलना कई स्थानों पर वर्णित है। यह अचरज की बात नहीं कि कभी कोई साधु मिल गए होंगे, जिनसे वह प्रभावित हुए हों। 

बुद्ध का तपस्वी बनना

अपने पुत्र राहुल को जन्म देने के बाद ही बुद्ध का संन्यास काल शुरू होता है। संभव है कि उन्होंने संन्यास से पहले अपने पिता को एक उत्तराधिकारी देने का वादा निभाया हो। ‘राहुल’ शब्द का एक अर्थ है ‘बंधन’। अधिकांश स्रोत यह इशारा करते हैं कि बुद्ध का संन्यास तय था, और उनका परिवार यह जानता था। बुद्ध के अपने शब्दों में 29 वर्ष की उम्र में संन्यास वर्णित है, जो कुछ अधिक उम्र लगती है। सत्रह वर्ष की उम्र में विवाह के बाद पुत्र-प्राप्ति 20-21 वर्ष में हो गयी होगी, और उसके बाद बुद्ध परिवार से अनुमति लेकर निकल गए। ख़ैर, यह 29 वर्ष बारंबार वर्णित है, इसलिए यही उम्र मान लिया जाए। 

लेकिन बुद्ध गए कहाँ? यूँ ही जंगलों में निकल गए, या उनका लक्ष्य तय था? अगर आज किसी को योगी बनना हो तो वह कहाँ जाएँगे? जाहिर है वह किन्हीं गुरु के पास जाएँगे, जिनको योग का ज्ञान हो। ‘मज्झिम निकाय सुत्त’ में इसका उत्तर मिलता है। 

मगध की राजधानी राजगृह पहाड़ों और जंगलों से घिरी थी (आज भी कुछ हद तक है)। वहाँ के योगी अलार कलामा की ख्याति थी, और बुद्ध भी कपिलवस्तु से निकल कर पहले उन्हीं के पास जाते हैं। कपिलवस्तु से राजगृह की दूरी 640 किलोमीटर है, जो गौतम घोड़े पर बैठ कर अपने सेवक चंडक के साथ तय करते हैं। इसी से स्पष्ट है कि यह एक योजनाबद्ध प्रवास था। बुद्ध इस यात्रा में अनोमा नदी पार करते हुए कहते हैं—

‘बारंबार बीज बोए जाते हैं, वर्षा होती है, किसान खेती करते हैं, अन्न उपजता है, वह संघर्ष करता है बारंबार। बारंबार जन्म और मृत्यु। किंतु जिसे परम ज्ञान की प्राप्ति होती है, वह इस चक्र से मुक्त हो जाता है’

यह मोक्ष की व्याख्या है, जो किन्हीं श्रमण से बुद्ध को मिली, और बुद्ध इसकी प्राप्ति के लिए निकल गए। दो-तीन वर्ष योग-शिक्षा लेने के बाद उनके गुरु का देहांत हो गया, और बुद्ध एक अन्य योगी राम की शरण में गए। राम की मृत्यु के बाद उनके पुत्र उद्रक ‘रामपुत्र’ से उन्होंने शिक्षा ली।

यह विश्वसनीय लगता है कि बुद्ध ने राजगृह आकर योग-साधना की शिक्षा ली होगी। मुझे यह पढ़ कर लगा कि जैसे आज बिहार के युवक कोचिंग के लिए पटना जाते हैं, उन दिनों राजगीर जाते होंगे। यह भी वर्णित है कि बुद्ध के चचेरे भाई महानामा और तीन अन्य शाक्य साथी भदिया, वपश्या और कौंडिण्य भी उद्रक के पास शिक्षा के लिए आ गए थे। यानी बुद्ध ऐसा करने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि यह एक परंपरा रही होगी। 

लेकिन योग-शिक्षा के बाद क्या? बुद्ध को तो मुक्ति का मार्ग ढूँढना था।

लेखक विश्वपाणी यहाँ वर्धमान (महावीर) का नाम लेते हैं, जो उन दिनों कई श्रमणों के गुरु थे। उनकी शिक्षा उस क्षेत्र में लोकप्रिय हो रही थी—

‘एक तपस्वी को एक ऐसा स्थान चुनना चाहिए जहाँ कोई जीव न हो। उसे भोजन पर जीना छोड़ देना चाहिए। उसे ऐसी इच्छा हो, तो उससे मुक्ति पानी चाहिए…यदि तपस्या करते हुए कोई पशु-पक्षी उसके शरीर का भोग करे, तो उसे किसी भी तरह की हिंसा नहीं करनी चाहिए’

इसके वर्णन मिलते हैं कि बुद्ध ने भी यह पद्धति अपना कर देखी। वह अपने चार साथियों के साथ प्राग्बोधि गुफा में भोजन त्याग कर तपस्या करने लगते हैं। एक समय उन्हें यह आभास हो जाता है कि मुक्ति का यह मार्ग अपने मृत्यु को आमंत्रण के सिवा कुछ नहीं है। बुद्ध के शब्द ईमानदार स्वीकारोक्ति की तरह वर्णित हैं—

‘मुझे लगा कि कुछ खा लेना चाहिए। थोड़ा ही सही…मेरा शरीर गल कर कंकाल हो गया है। मेरे अंग सूख कर काँटे हो गए हैं। पेट पर हाथ रखता हूँ तो रीढ़ की हड्डी महसूस होती है’

वह इस भौतिक सुखों की दुनिया और इस अजीवक तपस्वी जीवन के मध्य कोई मार्ग निकालना चाहते हैं। वह गुफा से फल्गु नदी की ओर बढ़ते हैं। 

लेखक इसे भी संयोग नहीं मानते कि बुद्ध गया ही पहुँचते हैं। वह लिखते हैं कि गया और मोक्ष का पौराणिक रिश्ता रहा है, और यहीं से बुद्ध की कथाओं में एक पात्र का प्रवेश होता है— मारा। यह बुद्ध के जीवन के ऐसे अवैज्ञानिक पात्र हैं, जिन पर लेखक को थोड़ा-बहुत विश्वास हो जाता है। 

एक दिन गौतम उरुविल्व (बोधगया) में निरंजना (फल्गु) नदी किनारे एक वृक्ष (गूलर या पीपल या वट) के नीचे बैठे। अगले दिन वह बुद्ध बन चुके थे। उस चौबीस घंटे में आखिर ऐसा क्या हुआ होगा? बुद्ध तो उससे पहले भी योग-साधना कर रहे थे, गुफा में बैठ कर भी साधना की, लेकिन उसी दिन ही क्यों निर्वाण मिला? 

कैसे मिला बुद्ध को निर्वाण? 

उस समय गौतम बुद्ध के गृह-त्याग के छह वर्ष पूरे हो चुके थे, और उनकी उम्र पैंतीस वर्ष थी। उस रात के वर्णन में एक मिथक है— मारा राक्षस और उसकी सेना। चूँकि यह मारा बुद्ध के जीवन में आगे भी कई बार आता है, और बुद्ध से संवाद करता है; कभी कृषक रूप में, कभी सिंह रूप में, कभी हाथी के रूप में, और कभी काले धुएँ के रूप में; यह वास्तव में कोई भौतिक दानव हो, यह संभावना कम है। मारा के संवाद भी किसी पौराणिक असुर या दानव जैसे नहीं दिखते, बल्कि बौद्धिक दिखते हैं। जैसे उस रात मारा कहता है— 

‘आप इतने हीन-दुर्बल हो गए हैं। मृत्यु के निकट हैं। आपको जीना चाहिए। अगर आप जिएँगे, तो अधिक यश कमाएँगे। आप धार्मिक जीवन जिएँ, अग्नि में होम करें, आपको सुख मिलेगा। इतना संघर्ष करने की क्या आवश्यकता?’

अगर पीछे की घटना देखें, तो बुद्ध ने प्राग्बोधि गुफा में भोजन त्याग दिया था, और गल कर कंकाल हो रहे थे। उनके मन में पहले भी ऐसी ध्वनि कौंधी थी। उसके बाद वह फल्गु नदी पार कर इस वृक्ष तक आते हैं। यहाँ आँखें बंद कर ध्यान करते हुए उन्हें मारा की आसुरी सेना दिखती है। किसी स्वप्न की तरह।

मारा के शब्दों में दो बातें दिखती हैं। पहला कि मारा उन्हें सांसारिक सुखों की ओर ले जाने की चेष्टा करता है। दूसरा कि अग्नि में होम करना ब्राह्मणों के जीवन से मेल खाता है। भला एक असुर ऐसा क्यों कहेगा कि बुद्ध ब्राह्मणों जैसी जीवन शैली अपनाएँ? क्या इस वर्णन में ब्राह्मणों के कर्मकाण्डों को मारा से जोड़ा गया है? 

मारा संभवतः गौतम बुद्ध के मन में उठ रहे प्रश्नों और आशंकाओं का समुच्चय था। मनुष्य की कामनाओं का, जीवन-मृत्यु के चक्र का, भय का, बंधनों का, कामेच्छा का। उस रात गौतम जब मारा की सेना को वज्रासन पर बैठ कर हराते हैं, यह कोई भौतिक घटना नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक घटना थी। बुद्ध स्वयं उस रात के विषय में क्या कहते हैं, यह कुछ यूँ वर्णित है—

‘मेरा मन इच्छाओं से मुक्त हो गया। मेरे अपने अस्तित्व से मुक्त। अज्ञान से मुक्त…और जब यह मुक्त हुआ, तब मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई। मुझे यह ज्ञान हुआ कि मेरा जन्म नष्ट हो चुका है, मेरा आध्यात्मिक जीवन भी समाप्त हो चुका है, मेरे कर्म समाप्त हो चुके हैं, अब मेरे मन में कोई इच्छा नही’

इसके सामान्य पाठ से लगता है कि बुद्ध अब आगे कुछ भी नहीं करना चाहते। बुद्ध अगले सात दिनों तक इसी मुद्रा में, उसी स्थान पर आँखें बंद किए मुस्कुराए बैठे रहते हैं। आठवें दिन वह उठ कर निर्णय लेते हैं कि उन्हें जो ज्ञान-प्राप्ति हुई, उसे पाँच शिष्यों को सिखाएँगे। वर्णित है कि उन्होंने दिव्य-दृष्टि से देखा कि वे पाँचों शिष्य वाराणसी के निकट एक हिरण उद्यान में बैठे हैं। दिव्य-दृष्टि को अगर आज की दुनिया में न भी मानें, तो इतना माना जा सकता है कि कुछ हफ्तों बाद गौतम बुद्ध वहाँ से निकले, सोन नदी और गंगा नदी पार करते हुए ढाई सौ किलोमीटर की पदयात्रा कर सारनाथ पहुँचे।

बुद्ध को बोधगया से सारनाथ पहुँचने में दो हफ्ते लगे होंगे, जिसकी कल्पना आज के नैशनल हाइवे 19 के किनारे चल रहे रास्ते से की जा सकती है। बौद्ध-जैन स्रोतों के अनुसार गंगा नदी पार करना श्रमणों के लिए मुफ्त सेवा थी। ये श्रमण आपस में बतियाते हुए जाते थे कि किनके गुरु कौन हैं, क्या-क्या ज्ञान मिला। उन दिनों मुख्यतः जैन और अजीवक श्रमणों का वर्चस्व था, जिनके गुरु क्रमशः वर्धमान महावीर और (उनके पूर्व शिष्य) मक्खली गोशाल थे। जब श्रमणों ने गौतम बुद्ध से पूछा कि उनके गुरु कौन हैं, तो बुद्ध ने क्या कहा? 

धम्मचक्र (धर्म का चक्र) क्या है? 

उपका नामक एक नग्न अजीवक श्रमण को बुद्ध ने कहा,

‘मेरा कोई गुरु नहीं। न मेरे जैसा कोई है। मेरा कोई समकक्ष नहीं। मैं ही परम ज्ञानी हूँ, और मुझे ही निर्वाण की प्राप्ति हुई है। मैं अब इस अंधी दुनिया में धर्म का चक्र चलाने निकला हूँ’

ऐसा कहने वालो की कमी नहीं थी, और हर दूसरे श्रमण स्वयं को श्रेष्ठ बताते, इसलिए उपका ने अधिक महत्व दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘अगर ऐसा है तो अच्छा ही है’, और चल दिए। 

इसिपटन (ऋषिपटन/सारनाथ) की यात्रा में ऐसे अन्य लोग भी मिले, जैसे एक ब्राह्नण निगरोध, जिन्होंने गौतम बुद्ध के दावे को खारिज कर दिया। इसिपटन पहुँच कर उन्हें वही अपने चचेरे भाई महानामा और अन्य शाक्य मित्र मिलते हैं, जिनमें चार तो उनके साथ प्राग्बोधि गुफा में भी थे। यह संभव है कि प्राग्बोधि गुफा से निकलने के बाद ये चारों इसिपटन का रुख़ कर गए हों, बुद्ध बोधि वृक्ष के नीचे बैठ गए हों। एक अन्य शाक्य अश्वजीत पहले से इसिपटन में थे, या आकर जुड़ गए। 

ख़ैर, गौतम बुद्ध ने वहाँ पहुँच कर उनसे कहा,

‘सुनो! जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल चुकी है। मैं अब तुम्हें सत्य की शिक्षा देने आया हूँ। यदि तुम मेरे मार्ग पर चलोगे तो तुम्हें भी मेरी तरह निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है’

उन्हें शंका हुई कि कुछ ही हफ्तों पहले गुफा में सभी साथ ही साधना कर रहे थे, उस वक्त तो ऐसा कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। अब ऐसा क्या हो गया? लेकिन उन्हें धीरे-धीरे यह विश्वास हो गया कि गौतम बुद्ध की वाणी अब पहले जैसी नहीं रही। बुद्ध ने ऐसा क्या कहा कि वे मान गए, यह आरंभिक स्रोतों में स्पष्ट नहीं है।

बाद में लिखे गए ‘धम्मचक्क पवत्तन सुत्त’ में इसकी व्याख्या की गयी है। चार सत्य और आठ मार्ग। कई बौद्ध विचारक मानते हैं कि बुद्ध की भाषा कहीं भी इस तरह बिंदुवार नहीं है, और वह प्रवाह में है। रिचर्ड गॉम्ब्रिच ने इन प्रश्नों से चिढ़ कर लिखा,

‘अब उस वक्त कोई टेप-रिकॉर्डर तो था नहीं कि बुद्ध का कहा हू-ब-हू रिकॉर्ड हो जाता। विद्वानों के बिंदुवार निष्कर्ष उनकी शिक्षा पर आधारित हैं, ताकि दुनिया को सरलता से मार्ग स्पष्ट हो’

जो भी हो, इन चार सत्य और अष्टांगिक मार्ग से दुनिया में बौद्ध धर्म का चक्र चलता है। चार सत्य हैं- 

1. दुख है

2. दुख का कारण तृष्णा/इच्छा है

3. दुख का निरोध संभव है

4. दुख निरोध का मार्ग अष्टांगिक है

आठ मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि

यूँ तो बुद्ध की मूर्तियाँ आज दुनिया भर में है। यह ऐसी मूर्ति है, जो नास्तिकों के घर में भी मिल जाएगी। मैंने अपनी पुस्तक ‘नास्तिकों के देश में-नीदरलैंड’ में वहाँ के वेश्यालयों में बुद्ध की मूर्ति का जिक्र किया है। लेकिन ये छवियाँ बुद्ध के कितने करीब रही होगी?

कैसे दिखते थे बुद्ध?

जहाँ अन्य कई श्रमण बाल लंबे बढ़ा कर रखते थे, बुद्ध ने अपने बाल बहुत पहले ही मुंडवा लिए थे। अक्सर ऐसा करने वाले श्रमण बालों को खींच-खींच कर जड़ से उखाड़ लेते थे, लेकिन बुद्ध की पोटली में सुई-धागे के साथ एक धारदार चाकू का जिक्र आता है। संभव है कि इससे वह अपने सर को नियमित उस्तरा लगा कर रखते हों।

बुद्ध के वर्णनों में गोल चेहरा, मुंडा सर, पैनी आँखें, दुबला-पतला किंतु मजबूत शरीर, आकर्षक छवि और स्पष्ट वाणी दिखती है। हालाँकि धूप में भटक-भटक कर उनका रंग समय के साथ साँवला पड़ गया और अन्य मनुष्यों की तरह उनका भी बुढ़ापा आया। उनके शिष्य और चचेरे भाई आनंद ने उनके विषय में लिखा है—

‘उनके चेहरे में अब वह चमक नहीं रही। उस पर झुर्रियाँ आ गयी हैं। हाथ-पैर झूल से गए हैं और रीढ़ सीधी नहीं रही’ 

बुद्ध की सबसे विस्तृत छवि एक ब्राह्मण उत्तरा के शब्दों में मिलती है, जिनके गुरु ने उनके पास यह देखने भेजा था कि पता करिए, यह वाकई परम ज्ञानी हैं या नहीं। उन्होंने लौट कर बताया कि एक महापुरुष में जो बत्तीस भौतिक चिह्न दिखनी चाहिए, वह सभी उनके शरीर में दिखती हैं।  उनके भोजन करने के विषय में उत्तरा कहते हैं—

‘वह जब चावल खाते हैं, तो कटोरे को न ऊपर उठाते हैं, न नीचे रखते हैं, न ही अपनी तरफ झुकाते हैं। न बहुत अधिक खाते हैं, न बहुत कम। वह उसमें उतना ही रस डालते हैं कि उचित कौर बन जाए। वह इसे ठीक से चबा कर निगलते हैं। वह स्वाद लेकर खाते हैं, किंतु इस स्वाद का मोह नहीं रखते’

बत्तीस भौतिक चिह्नों में लंबे कान, उंगलियों के मध्य कम स्थान, गज के समान मस्तक आदि वर्णित हैं। हालाँकि कुछ वर्णनों में ऐसी अतिशयोक्ति नहीं मिलती, और बुद्ध को देखने वाले उन्हें सामान्य पुरुषों जैसा ही बताते हैं, लेकिन उनके चेहरे में एक आकर्षक शांति दिखती है।

इतना तो कयास लगाया जा सकता है कि बुद्ध की वाणी ऐसी होगी कि लोग उन्हें सुनने बैठ जाएँ। एक वर्णन है कि एक कुष्ठ रोगग्रस्त व्यक्ति सुप्पबुद्ध ने देखा कि एक व्यक्ति को घेर कर कई लोग बैठे हैं। उन्हें लगा कि यहाँ मुफ्त भोजन बँट रहा होगा, तो वह भी कोने में बैठ गए। तभी बुद्ध ने उनकी तरफ मुख किया, और आसान भाषा में धर्म की व्याख्या करने लगे। 

इस प्रकरण में एक कुशल शिक्षक की छवि दिखती है, जो ‘लास्ट-बेंचर’ से भी संवाद करने में सफल हों। अगर ऐसा न होता, तो अपने जीवन-काल में ही इतने अधिक शिष्य कैसे बनते कि अगली कई सदियों तक उनकी शिक्षा प्रचारित हो रही होती! 

बुद्ध स्वयं इस विषय में कहते हैं,

‘मैं उनकी (शिष्यों की) ध्वनियों से अपनी ध्वनि मिला लेता  हूँ। उनके चेहरे से अपना चेहरा। उनके स्तर पर जाकर अपनी बात कहता हूँ ताकि न सिर्फ वे मुझे समझ पाएँ, बल्कि मेरे जैसा बनने का आत्मविश्वास ला पाएँ’

वह उदाहरण भी उसी अनुसार देते। किसानों से बात करते खेतीबाड़ी। ब्राह्मणों से बात करते हुए दर्शन। वह संस्कृत के बजाय स्थानीय बोली में संवाद अधिक करते।

उत्तरा के अनुसार, 

‘वह शिक्षा देते हुए अक्सर प्रश्न पूछते रहते हैं, और अपनी बात थोपते नहीं चले जाते, बल्कि हर उत्तर को ध्यान से सुनते हैं, और अंत में उन उत्तरों के आधार पर ही निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। इससे शिष्य को लगता है कि हल बुद्ध ने नहीं, उन्होंने ही ढूँढा। बुद्ध ने तो मात्र मार्ग दिखाया’

दुनिया की पहली बृहत मिशनरी या धर्म-प्रचारक प्रवृत्ति बौद्ध मानी जा सकती है। इसकी शुरुआत ही धर्मचक्र चलाने से होती है, जिसका उद्देश्य था पूरी दुनिया में विस्तार। इससे पहले जैन श्रमण मौजूद थे, लेकिन उस गति, योजना और स्तर तक नहीं, जितने बौद्ध। आज देखा जाए, तो बौद्ध दीक्षा लेना और उनके नियमों से बंधना कठिन है। फिर बुद्ध के समय यह कैसे आसान हो गया?

कैसे बनते गए बुद्ध के शिष्य?

गौतम बुद्ध के पहले ‘अर्हत’ कौण्डिन्य को माना जाता है। पहले दीक्षित शिष्य। यह उन पाँच शिष्यों में थे, जिन्हें बुद्ध का ज्ञान सबसे पहले समझ आया, या यूँ कहें जिन्हें बुद्ध पर सबसे पहले विश्वास हुआ। उसके बाद शेष चार शिष्य भी अर्हत बने। इसिपटनम (सारनाथ) के पहले पाँच ग्रैजुएट।

हालाँकि ये पाँचों तो शाक्य कुल के ही थे, तो इसे शायद एक बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं मानी जाएगी। छठा अर्हत कौन?

काशी महाजनपद में वाराणसी समृद्ध व्यापारियों का नगर भी था, जहाँ कपड़े, आभूषण, इत्र, वास्तुकला आदि का व्यापार होता। ऐसे ही एक धनी परिवार में हुए — यश। वह एक दिन इसिपटनम आए, और बुद्ध से मिलते ही उनके शिष्य बन गए। शीघ्र ही वह छठे अर्हत बने। 

उसके बाद तो यश के माता-पिता और उनके व्यापारी समाज के बंधु-बांधव बौद्ध अर्हत बनते चले गए। कुछ ही महीनों बाद वाराणसी में 61 अर्हत बन चुके थे!

क्या इतनी जल्दी किसी पंथ में शामिल हुआ जा सकता है? किसी व्यवसायी और पारिवारिक व्यक्ति के लिए बुद्ध के आठ मार्गों को अपनाना तो बहुत कठिन है। क्या सभी ने घर त्याग कर, बाल मुंडा कर, भिक्षाटन शुरू कर दिया?

जब वाराणसी के एक व्यक्ति धम्मदीन ने बुद्ध से पूछा, ‘हमें आपकी शिक्षा आकर्षित करती है, और पूरी आस्था भी है। लेकिन काशी में चंदनलेप और इत्र लगाते, सुंदर वस्त्र और आभूषण पहने लोग, जिनके घरों में बच्चों की किलकारियाँ गूँज रही हैं, वे कैसे आपको अपनाएँ?’ 

बुद्ध ने कहा, ‘उन्होंने मुझमें आस्था रख ली, तो पहली सीढ़ी पार कर ली। उन्होंने मेरे बताए धर्म के सत्य को मान लिया, तो दूसरी सीढ़ी पार कर ली। जब वे भविष्य में हमारे संघ के शिष्यों से जुड़ जाएँगे, वे तीसरी सीढ़ी पार कर लेंगे। वे अपने व्यस्त जीवन में भी ये तीन प्रतिज्ञाएँ ले सकते हैं— बुद्धम शरणम गच्छामि, धर्मम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि’

यह किसी शॉर्ट-कट की तरह लगता है कि बस ये तीन मंत्र पढ़े, और बौद्ध बन गए। उन आठ मार्गों का पालन और दुखों से मुक्ति इस मंत्र मात्र से तो नहीं हो सकती। चूँकि यह एक प्रतिज्ञा रूप में थी, कर्तव्य रूप में नहीं, इसलिए धीरे-धीरे लोग सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ सकते थे। किया गया वादा बाद में निभा सकते थे। 

किंतु शाक्य कुल के कुटुंबों और वाराणसी के धनी परिवारों को अर्हत बनाना पर्याप्त नहीं था। असली चुनौती तो यह थी कि ब्राह्मणों, आजीवक और जैन श्रमणों को कैसे अपने मार्ग पर लाएँ। सामंतों और राजाओं को कैसे अपना शिष्य बनाएँ। बुद्ध का ध्येय भले यह न रहा हो, इतिहास गवाह है कि धर्म का चक्र इन शक्तियों के बिना चलना कठिन है। 

बुद्ध ने वापस वहीं का रुख किया, जहाँ से उनकी यात्रा शुरू हुई थी। मगध की राजधानी राजगृह। 

एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को भगवान कैसे माने? गौतम बुद्ध सामान्य मनुष्य के अनुभवों से ज्ञान की बात करते रहे, लेकिन आज भी आम आदमी चमत्कार को प्रणाम करते हैं। उन्हें लगता है कि अलौकिक व्यक्ति ही देवतुल्य है, मनुष्य की क्या औक़ात? चाहे दुनिया की कोई भी आस्था हो, उनके देवता और मसीहा की कहानियाँ मानव की क्षमताओं से परे दिखती हैं। इस कारण जहां एक बड़ा वर्ग उन पर आस्था रखता है, तर्कशील वर्ग शंकित ही रह जाता है।

क्या गौतम बुद्ध चमत्कारी पुरुष थे?

गौतम बुद्ध की पहली जीवनी जो उनकी मृत्यु के बाद लिखी गयी, वह है ‘महावग्ग’। यह अब बौद्ध त्रिपिटक के विनय पिटक का हिस्सा है। यह माना जा सकता है कि कुछ स्वाभाविक अतिशयोक्ति के बावजूद इसमें बुद्ध के जीवन की सबसे करीबी स्मृति दर्ज होगी।

गौतम बुद्ध इसिपटनम (सारनाथ) से गंगा नदी पार कर पुनः उरुविल्व (बोधगया) पहुँचे। वहाँ के महापुरोहित कश्यप से उन्होंने अग्नि-गर्भ में जाने की अनुमति माँगी। यह मान्यता थी कि यह गर्भ निरंजना (फल्गु) नदी के नागों द्वारा संरक्षित है, जिसमें सामान्य पुरुष टिक नहीं सकता। बुद्ध ने इसमें पूरी रात बिता ली। यह उनके पहले चमत्कार रूप में वर्णित है।

साँपों द्वारा संरक्षित दहकती आग के कमरे से बाहर निकल जाना। इसमें साँप को किनारे कर दें, तो गया के श्मशान में अग्नि-गर्भ रहे होंगे। गौतम बुद्ध ने इसमें रात बितायी हो, यह चमत्कृत कर सकता है। इस घटना के बाद ही कश्यप पुरोहित के साथ उनके अन्य सहयोगी ब्राह्मण भी बुद्ध के साथ जुड़ जाते हैं। वे बाल मुंडा कर बौद्ध अर्हत बन जाते हैं।

क्या शास्त्रों द्वारा विजय से अधिक आसान था चमत्कृत करना? आग या पानी पर चलना अथवा हवा में उड़ना एक भौतिक उपलब्धि हो सकती है, किंतु परम ज्ञान कैसे?

अन्य महामानव गुण जो वर्णित हैं, वे हैं— किसी व्यक्ति का मन पढ़ लेना, आवाज (बिना चिल्लाए) दूर तक पहुँच जाना, भूकंप ले आना आदि। कुछ ऐसे जादुई गुण रहे हों, यह आश्चर्य नहीं, क्योंकि बिना ऐसी शक्तियों के शिष्य बनाना तो आज भी कठिन है। 

जब गौतम बुद्ध राजगृह की ओर बढ़े तो उनके काफिले में हजार लोग जुड़ गए थे, जिनमें कश्यप पुरोहित आगे चल रहे थे। मगध के महाराज बिंबिसार तक सूचना पहुँची कि किसी महान श्रमण का उदय हुआ है। जैन स्रोतों के अनुसार बिंबिसार ने जैन आस्था स्वीकार ली थी, और महावीर को अपना गुरु मान चुके थे। लेकिन एक राजा होने के नाते उन्होंने गौतम बुद्ध का भी स्वागत किया। विशेषतः कश्यप पुरोहित के अनुमोदन ने गौतम बुद्ध को उनकी नज़रों में शीघ्र स्वीकार्यता दे दी।

जब राज्याश्रय मिल गया, फिर तो पूरे प्रांत में बौद्ध भिक्षु घूमने लगे और शिष्य बढ़ते ही चले गए। हालाँकि ऐसी शंकाएँ भी वर्णित हैं, कि माता-पिता इन भिक्षुओं से अपने पुत्र को बचाते थे। उन्हें भय था कि उनकी संतान भी संन्यासी बन कटोरा लेकर न घूमने लगे। बुद्ध के विरुद्ध नारेबाजी होने लगी। जब भिक्षु चिंतित होकर उनके पास आए तो बुद्ध ने कहा,

‘धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वालो से कोई द्वेष नहीं करता। आप निश्चिंत रहें, और इसी मार्ग पर चलते रहें’

उस समय मगध में जिन श्रमणों का वर्चस्व था, उनमें सर्वाधिक अनुयायी थे वर्धमान महावीर और मक्खली गोशाल के। उसके बाद क्रमशः संजय बेलठ्ठीपुत्र और उद्रक रामपुत्र के अनुयायी थे। इनमें से महावीर और उद्रक रामपुत्र का अनुसरण तो स्वयं गौतम बुद्ध भी कर चुके थे। लेकिन अब उनका कद बढ़ता जा रहा था। अपने गुरु उद्रक से वह कहीं आगे निकल चुके थे।

एक दिन गौतम बुद्ध के शिष्य अश्वजीत दो युवकों को अपने साथ लाए। उपत्तिस्सा और कोलिता नामक ये युवक संजय बेलठ्ठीपुत्र के पट-शिष्य थे। एक के पास बृहत शास्त्र-ज्ञान था और दूसरे के पास मनोवैज्ञानिक शक्ति। बुद्ध ने इन दोनों को दीक्षा देकर नए नाम दिए— सारिपुत्र और मौद्गल्यायन। बुद्ध की कई छवियाँ जो हम तस्वीरों में देखते हैं, उसमें ये दोनों साथ खड़े होते हैं। 

इन दोनों के बुद्ध से जुड़ते ही संजय बेलठ्ठीपुत्र के कई शिष्य बौद्ध बन गए। इस कारण हृदयाघात से संजय की मृत्यु हो गयी। मगध में अब बौद्ध श्रमणों का बोलबाला हो रहा था, वहीं वृज्जि (वैशाली) में जैन श्रमणों का वर्चस्व था। 

सात वर्ष कपिलवस्तु से दूर रहने के बाद अब गौतम बुद्ध घर लौट रहे थे।

नयी आस्था पर सवाल उठते ही हैं। बुद्ध पर भी उठते रहे। जैन और बौद्ध की श्रेष्ठता के आपसी विवाद सूक्ष्म स्तर पर आज भी चल रहे हैं। ब्राह्मणों और बौद्ध की लड़ाई किस हद तक पहुँची, यह हम आगे पढ़ेंगे। आज स्थिति यह है कि भारत से शुरू हुए बौद्ध धर्म के चिह्न, ग्रंथ और बौद्धों की संख्या भारत से बाहर अधिक मिलते हैं। फाह्यान, ह्वेनसांग से लेकर तिक न्यात हन्ह, हरमन नेस आदि को पढ़ कर बुद्ध के पदचिह्न ढूँढने पढ़ते हैं। कई भारतीय मानते ही नहीं कि बुद्ध नामक कोई व्यक्ति थे। यह तो अहंकार ही कहा जाएगा अगर फिर भी भारतीय स्वयं को बौद्ध धर्म का श्रेष्ठतम विशेषज्ञ कहते हैं।

कैसे शुरू हुआ बुद्ध का विरोध, और कैसे किए संवाद?

बुद्ध घर त्यागने के बाद लापता नहीं हो गए। उनके पिता शुद्धोधन को यह जानकारी अवश्य रही होगी कि वह कहाँ हैं। जब मगध नरेश बिंबिसार ही बुद्ध का सम्मान कर रहे थे, तो बुद्ध कोई गुमनाम व्यक्ति नहीं रहे। इसके भी वर्णन हैं कि जिन पाँच शाक्य बंधुओं को बुद्ध ने शिष्य बनाया, उनमें से दो को शुद्धोधन ने ही भेजा था कि बुद्ध को मना कर ले आएँ। यूँ भी जब ये चचेरे भाई राजगृह से सारनाथ तक साथ थे, तो यह अज्ञातवास था ही नहीं। 

इसके बावजूद जब बुद्ध कपिलवस्तु लौटे, नगर के बाहर निगरोध कुंज में बस गए। यह वर्णन नाटकीय लगता है कि वह अपने घर लौट कर भी घर नहीं गए। वहीं दूसरी तरफ़, वह कुल त्याग कर भी न सिर्फ स्वयं को शाक्य कहते रहे, बल्कि अपने शिष्यों की मंडली को भी शाक्य श्रमण कहा। यदि वंश-मोह था तो इसे त्यागा ही क्यों? आरंभिक बौद्ध शाक्य कुल के ही क्यों थे? क्या वह पहले ‘अपने लोगों’ में आस्था का संचार करना चाहते थे? 

वर्णन है कि जब बुद्ध कपिलवस्तु में भिक्षाटन पर निकले तो उनके पिता ने डाँट कर कहा, ‘तुम्हें इन फटे-चिथड़े कपड़ों में भटकने की आवश्यकता क्या है? तुम शाक्य-पुत्र हो’

इसके उत्तर में गौतम ने कहा, ‘मैं अब शाक्य-वंश का नहीं, बुद्ध वंश का हूँ, और मेरे शिष्य भी बुद्ध ही होंगे’

धीरे-धीरे उनके परिवार के लोग उनसे मिलने आने लगे। उनके सेवक रहे चंडक सबसे पहले अर्हत बने। उसके बाद उनके सौतेले भाई नंद, चचेरे भाई आनंद और अनिरुद्ध, ममेरे भाई देवदत्त, मित्र भृगु और किंबाल आदि बौद्ध बनते गए। जब गौतम के सात वर्षीय पुत्र राहुल उनके पास आए, तो शुद्धोधन का धैर्य टूट गया। 

उन्होंने कहा, ‘जब तुमने हमें छोड़ कर जाने का निर्णय लिया, हम दुखी हुए। अब तुमने अपने भाइयों को भी अपने साथ शामिल कर लिया। किंतु राहुल तो अभी बालक है, इस वंश का उत्तराधिकारी है। उसे तो मेरे पास रहने दो’

गौतम ने कहा, ‘उसका उत्तराधिकार ही तो उसे सौंप रहा हूँ। वह सरीपुत्र और मुदग्ल्यायन की शिक्षा में एक अर्हत बनेगा’ 

इसके चार वर्ष बाद शुद्धोधन का देहांत हो गया (वर्णित है कि मृत्यु-शय्या पर बुद्ध ने उन्हें भी अर्हत दीक्षा दी)। उन्हीं दिनों गौतम ने कोलिय और शाक्य समुदाय के मध्य एक रोहिणी नदी जल-विवाद सुलझाया। इसके बाद दोनों कुलों के तमाम लोगों ने बुद्ध का मार्ग स्वीकार कर लिया।

अपने परिवार का विरोध समाप्त करने के बाद बुद्ध का अगला संवाद इससे कठिन था। यह संवाद उनसे था, जो रक्त से नहीं, किंतु विचारों से उनके जैसे ही थे। वे भी निर्वाण पथ पर थे। राजगीर से आगे धान के खेतों की मेड़ों पर श्रमणों की शृंखला चल रही थी, जिसमें एक वृद्ध श्रमण थे संजय बेलठ्ठीपुत्र के शिष्य सुप्पिय, और दूसरे वर्धमान महावीर के शिष्य सच्चक। दोनों ही अपने-अपने मार्गों को श्रेष्ठ बता रहे थे। जब ये एक बड़े मैदान में जाकर रुके, तो उस रात श्रमण-समूहों के मध्य वाद-विवाद की ध्वनियाँ गूँजने लगी।

अगली कई सदियों तक यह स्थान ऐसे ही विमर्श और मीमांसा के लिए जाना गया। राजगृह से कुछ ही दूर स्थित— नालंदा।

श्रमणों के दो प्रमुख वर्ग थे— शाश्वतवादी और शून्यवादी। जहाँ शाश्वतवादी यह मानते कि आत्मा अजर, अमर है, शून्यवादी मानते थे कि कुछ है ही नहीं। उन दिनों शाश्वतवादी जैसे जैन और अजीवक की ही प्रमुखता थी, इसलिए बुद्ध के संवाद उनसे अधिक हैं। जैन श्रमण सच्चक से संवाद तो विश्वसनीय नहीं, क्योंकि उसमें एक यक्ष वज्रपाणि (जिसके हाथ में वज्र हो) के माध्यम से बुद्ध को विजेता घोषित कर दिया गया है। ऐसे अवैज्ञानिक वर्णन से इतर देखा जाए, तो बुद्ध के तर्क क्या थे।

क्या था बुद्ध का मध्य-मार्ग?

श्रमण वच्चगोत्त ने बुद्ध से पूछा, ‘ब्रह्माण्ड का अंत है या अनंत?’

बुद्ध ने कहा, ‘मैं दोनों में से कुछ भी नहीं मानता’

वच्चगोत्त ने पूछा, ‘क्या आत्मा और शरीर एक है?’

बुद्ध ने कहा, ‘मैं दोनों में से कुछ भी नहीं मानता’

‘मृत्यु के बाद तथागत रहेंगे, या नहीं? क्या आत्मा अमर है या यह शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती है?’, वच्चगोत्त ने पूछा

‘मैं दोनों में से कुछ भी नहीं मानता’, बुद्ध ने कहा

वच्चगोत्त ने निराश होकर कहा, ‘मुझे जब आप पहले (वैशाली में) मिले थे, तो अधिक स्पष्टता थी, अब मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा’

वहीं बैठे एक बौद्ध अर्हत मलुंक्यपुत्त ने कहा, ‘यदि आप इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते, तो मैं भी आपका मार्ग त्याग दूँगा’

बुद्ध ने कहा, ‘मान लो किसी व्यक्ति के सीने में एक जहरीला तीर घुस गया हो। उस व्यक्ति ने यह घोषणा कर दी हो कि तब तक तीर नहीं निकालेगा, जब तक इसे मारने वाले का कुल नहीं पता लगता, इस तीर में प्रयुक्त पदार्थों का ज्ञान नहीं होता…जबकि अनुभव यही कहता है कि इन प्रश्नों में उलझने से पहले— तीर निकाल ली जाए’

‘अर्थात् इन प्रश्नों का कोई अर्थ नहीं? आत्मा न मरती है, न अमर है?’

‘इन प्रश्नों में उलझने का अर्थ नहीं’, बुद्ध ने कहा

बुद्ध ने मिट्टी खरोची, और अपनी नाखून में फँसे धूल को दिखा कर कहा, ‘हमारा इतना सा अंश भी शाश्वत नहीं, अजर नहीं, यह सतत परिवर्तनशील है। इसलिए उत्तर हमें अपने अनुभवों से ‘है’ और ‘नहीं है’ जैसी दो धुरियों के मध्य कहीं मिलेंगे’

सवालों के उत्तर न देना जहाँ एक तरफ पलायनवादी लग सकता है, वहीं यथार्थवादी भी। श्रमणों में यह धारणा थी कि साधना द्वारा वह शाश्वत आत्मा से संवाद कर सकते हैं, उस आत्मा से जो अमर है। जबकि बुद्ध इसे निरर्थक मानते थे। इसके लिए भी बुद्ध के पास एक सरल उदाहरण  था— 

‘एक राजा ने संगीत सुना, और आदेश दिया कि वह संगीत लाकर दिया जाए। सेवक बाँसुरी लेकर आ गए, तो उसने डाँट कर कहा कि संगीत कहाँ है! सेवक ने बताया कि संगीत तो इसी से उत्पन्न होता है, जब इसे वादक बजाते हैं। राजा ने कहा कि मुझे यह लकड़ी का टुकड़ा नहीं, मात्र संगीत ही चाहिए, वह निकाल कर दे दो। जब सेवक ने असमर्थता जतायी, तो राजा ने उस बाँसुरी को तोड़ दिया, आग लगा कर राख कर दिया कि कहीं तो संगीत छुपा होगा, लेकिन कुछ नहीं मिला…आत्मा से संवाद कुछ ऐसी ही कोशिश है।’

जिस समय श्रमण एक टाँग पर खड़े होकर, भोजन त्याग कर, दुख सह कर, आत्मा से संवाद के लिए साधना कर रहे थे, उस समय बुद्ध ने अनुभूति का मार्ग दिखाया। यह कठोर तपस्या और भोग-विलास के बीच का मार्ग था। 

हालाँकि यह पढ़ते हुए बुद्ध की शिक्षा गोल-गोल घूमती दिखती है। तपस्या न करें, भोग भी न करें, तो आखिर करें क्या? क्या नौ से पाँच ऑफिस जाने वाले, बस की खिड़कियों से दुनिया निहारते सामान्य लोग मध्य मार्ग पर चले जा रहे हैं?  भारी-भरकम दर्शन का तड़का बिना लगाए, सीधे-सीधे अगर पूछा जाए कि करना क्या है, तो उत्तर क्या होगा? 

इसके लिए जानना होगा कि वे राजा, वे किसान, वे व्यापारी जो बौद्ध अर्हत बन रहे थे, वे कैसा जीवन जी रहे थे। मध्य मार्ग पर वह किस तरह चल रहे थे।

भिक्खु (भिक्षु) और भिक्खुनी शब्द बुद्ध के बाद आए। बुद्ध के समय या उनके बाद भी यह मानना कि हर बौद्ध भिक्षाटन करते थे, सही नहीं है। यदि सभी भिक्षाटन ही करते, तो भीख देने वाले कौन होते? विहार और स्तूप कौन बनवाते? क्या बिना सर मुँडाए, चिवर (काषाय या फीका) वस्त्र पहने, बिना हाथ में कटोरा लिए, सामान्य जीवन जीते लोग भी बौद्ध हो सकते थे?

बुद्ध के समय बौद्ध होने का अर्थ क्या था?

आम जनता के लिए जब मध्य मार्ग सुझाया गया, तो उसका अर्थ यह भी था कि न कठोर तपस्या मार्ग पर चलने की जरूरत है, न भोग-विलास की। तृष्णा, जो दुखों का स्रोत है, उससे मुक्ति पानी है। इसके लिए बुद्ध ने तीन मुख्य क्रियाएँ सुझाई। पहला कि नैतिक जीवन जीएँ, दूसरा कि ‘ध्यान’ से मस्तिष्क को विकसित करें, और तीसरा कि ‘अनुभूति’ से ज्ञान की प्राप्ति करें।

आज की दुनिया में रोज ऑफिस जाते व्यक्ति भी ये तीनों कार्य कर सकते हैं, और उस समय भी करते थे। 

नैतिक जीवन में पाँच चीजें महत्वपूर्ण थी— जीव-हत्या न की जाए, किसी से वह चीज न ली जाए जो स्वेच्छा से न दी गयी हो, असत्य न बोलें, नशा न करें, व्यभिचार न करें। हालाँकि यह नैतिक शिक्षा कोई नयी नहीं थी, और महावीर की शिक्षा से मिलती-जुलती थी, लेकिन बुद्ध ने इसमें कर्म के साथ-साथ ‘सोचने’ को भी जोड़ लिया। जैसे— व्यभिचार और नशे के विषय में सोचना भी गलत है। इन कर्मों की मनसा भी न हो।

साधना मुख्यतः योगासन थे, जो पहले से मौजूद थे, जिनमें ध्यान के कुछ अंग बुद्ध द्वारा जोड़े गए। ध्यान करते हुए तृष्णा से मस्तिष्क का मुक्त होते जाना। आँख बंद कर अगर हम कुछ कामना कर रहे हैं, तो वह ध्यान नहीं कहलाएगा।

अनुभूति से ज्ञान के लिए सभी इंद्रियों का सतत प्रयोग करने कहा गया। बुद्ध ने कहा,

‘हम जब आगे चलें या पीछे जाएँ, सामने देखें या किसी अन्य दिशा में, झुकें या खड़े हों, भोजन कर रहे हों, नित्य-कर्म कर रहे हों, बोल रहे हों या शांत हों, जाग रहे हों या सो रहें, सभी क्रियाएँ हमें पूर्ण संज्ञान में करनी है’

उनका मानना था कि सांसारिक दुख से परिचय अनुभूति से संभव है। पूर्ण संज्ञान से किए गए कार्यों से। हमें तृष्णा और भय से विचलित नहीं होना। उन्होंने एक उदाहरण दिया— 

‘मान लें हमारे सर पर एक तेल से भरा पात्र रखा है, और कोई आकर कहता है कि चलो! वहाँ एक सुंदरी नृत्य कर रही है, वहीं पीछे एक व्यक्ति तलवार लिए खड़ा है कि अगर तेल की एक बूँद भी गिरी है तो मार डालेगा…यह दोनों ही स्थितियाँ हमें विचलित नहीं करनी चाहिए’ 

हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं कि बौद्ध भिक्षु थे ही नहीं, या स्वयं बुद्ध भिक्षाटन नहीं करते थे। बल्कि बौद्ध श्रमणों के नियम कठिन थे। वे घर त्याग चुके थे, यौन संबंधों से मुक्त थे, और भिक्षा माँग कर ही रहते थे। उनकी संपत्ति में चार चीजों की अनुमति थी— तीन चिवर वस्त्र, एक कटोरा, रहने का स्थान (सड़क/जंगल/बसेरा आदि), औषधि। जहाँ जैन श्रमण बाल जड़ से उखाड़ लेते थे, बुद्ध ने उस्तरा के प्रयोग की अनुमति दे दी थी। वहीं भले ही जीव-हत्या की अनुमति नहीं थी, यदि भिक्षा में मांस मिले, तो उसकी अनुमति दे दी गयी थी।

जहाँ बौद्ध निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान चलायमान होते, कुछ महीनों के लिए वे एक ही स्थान पर रुक जाते। बरसात के समय। यह कहलाता— वर्षावास। जब श्रमणों कि संख्या बढ़ने लगी, तो उनके इस वर्षावास के लिए किसी बड़े स्थान की जरूरत थी। किसी सुरक्षित वन की, किसी मठ की, किसी विहार की। 

लद्दाख में हमें सड़कों के किनारे और वीराने में सैकड़ों सफेद टीला-नुमा आकृतियाँ दिखती हैं। उनमें अधिकांश छोटे-छोटे स्तूप हैं। जब मैंने पूछा कि क्या इस स्तूप में पूजा होती है, तो उत्तर मिला कि नहीं! ये तो मात्र चिह्न हैं। इनके अंदर कोई भवन नहीं। बुद्ध के समय ऐसे स्तूपों का ख़ास वर्णन नहीं है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ टीला है, जो बुद्ध के बाद स्मृति-चिह्नों के रूप में बनते गए। बुद्ध के कालखंड में बौद्ध कहाँ जमा होते थे? संघम शरणम् गच्छामि में ‘संघ’ आखिर कहाँ था? 

कैसे रहते थे बुद्ध अपने विहार में? 

बौद्ध संघ के लोग जहाँ वर्षावास में विश्राम करते, वह स्थान संघाराम कहलाता। लेकिन इन भिक्षु प्रवृत्ति के लोगों के पास अपनी जमीन तो थी नहीं। ये अपनी संपत्ति त्याग चुके थे, फिर सैकड़ों बौद्ध के पास ये विहार आए कहाँ से?

पहला संघाराम मगध नरेश बिंबिसार ने राजगृह के निकट एक जंगल में बनाया, जो कहलाया— वेणुवन। दूसरा बड़ा संघाराम श्रावस्ती के निकट राजकुमार जेत का जेतवन था, जिसे एक धनाढ्य व्यक्ति अनंतपिंडिका ने खरीद कर बौद्धों को दान दिया। बुद्ध की प्रथम जीवनी महावग्ग में वर्णित है कि जेतवन एक विशाल मठ था, जहाँ कई बड़े भवन, और तालाब थे। हालाँकि जेतवन की खुदाई में ऐसे भव्य सुसज्जित मठ के अवशेष अब तक मिले नहीं हैं। 

ह्वेनसांग के संस्मरणों में बीस संघारामों का वर्णन मिलता है, जिनमें नालंदा सबसे विशाल था, और हजारों बौद्ध वहाँ रहते थे। भले बुद्ध मात्र बरसात के दिनों में यहाँ रहने कहते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि उनके अनुयायी यहाँ पूरे वर्ष ही टिक कर रहने लगे। ख़ैर, बाद में क्या-क्या हुआ, इसकी चर्चा आगे होगी, बुद्ध की दिनचर्या इन विहारों में किस तरह थी, यह कुछ यूँ वर्णित है—

‘बुद्ध दायीं करवट लेकर मात्र एक घंटा ही सोते थे। मुँह-हाथ धोकर ध्यान करते। धूप चढ़ने से पहले वह जेतवन से खेतों की ओर निकल जाते। श्रावस्ती के बाज़ारों और गलियों में भिक्षाटन पर। कभी अकेले, कभी अपने अनुयायियों के साथ। हाथी-घोड़े, बैलगाड़ियों, ढोल, गीत-नाद के कोलाहल में बुद्ध एक कटोरा लिए भ्रमण करते।

वापस लौट कर वह भोजन करते, और फिर जंगलों की ओर निकल जाते। वहाँ कुछ घास-पत्ते चुन कर उसे आसन बना लेते और पालथी मार कर, सीधी पीठ कर, ध्यान-मग्न हो जाते। वह ध्यान करते हुए प्राणायाम (साँसों का व्यायाम) भी कर रहे होते।

वहाँ से दोपहर के बाद लौट कर वह गंधकुटी में बैठ जाते, और अपने शिष्यों से बातें करते। उनके प्रश्नों का उत्तर देना। उन्हें नित्य नए लक्ष्य देना। इसके बाद बुद्ध वहीं लेट कर विश्राम करते।

शाम को नगर के तमाम प्रतिष्ठित और धनाढ्य व्यक्तियों से लेकर दूर-दूर से आम जनता उनसे मिलने आती। कुछ लोग उनके मार्ग पर चलने की इच्छा जगाते, जिन्हें वह सरल भाषा में सूत्र बताते। वह उनसे दर्शन की बातें कम और घरेलू उदाहरण अधिक देते। जो जिस परिवेश से है, उसी अनुसार।

बुद्ध अक्सर शाम को ही किसी तालाब या नदी में स्नान करते। वह जल से बाहर आकर वहीं थोड़ी देर खड़े होकर अपने शरीर को सुखाते। उसके बाद वहीं किनारे बैठ कर पुनः ध्यान-मग्न हो जाते। उसके बाद खड़े होकर रात में, खुले आकाश के नीचे आगे-पीछे चलते रहते। उस वक्त उनसे कोई बात नहीं कर सकता था। यह भी उनके ध्यान का ही अंग था। उसके बाद वह अक्सर किसी पथरीली या कठोर जमीन पर सो जाते।’

बुद्धघोष ने यह दिनचर्या बुद्ध के हजार वर्ष बाद लिखी। इस कारण इस पर पूरी तरह विश्वास करना कठिन है, लेकिन इसके अतिरिक्त विकल्प ही क्या है? बौद्ध-विहारों में कमो-बेश ऐसी दिनचर्या रही होगी।

बाद के वर्षों में जब बुद्ध से मिलने वालो की संख्या बढ़ने लगी, तो बुद्ध ने एक निजी सहायक (पर्सनल असिस्टेंट) रखना शुरू कर दिया। जहाँ पहले सारिपुत्र और मौद्गल्यायन उनके साथ रहते थे, बाद में मेघिया और नगिता रहे, पचपन वर्ष की उम्र में बुद्ध के स्थायी सहायक बन गए— आनंद। बुद्ध के चचेरे भाई (महानामा के अनुज)। जिसे भी बुद्ध से साक्षात्कार करना होता, वह पहले आनंद से अनुमति लेते। हम आज बुद्ध के विषय में जो भी प्राथमिक स्रोत जानते हैं, वह अधिकांश आनंद की स्मृतियों से ही है।

आनंद की तीन शर्तें थी— पहली कि बुद्ध की हर शिक्षा में वह साथ रहेंगे। दूसरी कि अगर बुद्ध ने कहीं किसी को शिक्षा दी, तो वह आनंद को बताएँगे। तीसरी कि आनंद के निजी प्रश्नों के उत्तर स्वयं बुद्ध देंगे।

जैसे-जैसे संघाराम विहार बनने लगे, विवाद भी होने लगे। ऐसे विवाद जिसे सुलझाना बूढ़े हो रहे बुद्ध के लिए भी कठिन था। पहला विवाद शुरू हुआ वत्स महाजनपद की राजधानी कौशाम्बी के संघाराम में।

‘कंफेशन’ यानी अपने पापों को स्वीकारना, यह अन्य आस्थाओं में भी है। इसका दूसरा रूप है कि सप्ताह का एक दिन शील और धर्म के लिए सुनिश्चित रखना। यहूदियों और ईसाइयों के सब्त (sabbath) भी ऐसे उदाहरण हैं। बुद्ध ने हर पूर्णिमा और अमावस्या का दिन ‘उपोसथ’ रखा, जिसमें न सिर्फ़ अष्टशील का पालन करना होता, बल्कि सभी बौद्ध अपने किए गए पापों और तोड़े गए नियमों की समीक्षा करते। यह संभव है कि बुद्ध ने जैन श्रमणों के पर्युषण या क्षमा पर्व के आधार पर यह पद्धति अपनायी हो, लेकिन इसके कारण बौद्ध मठों में मतभेद उभरने लगे। 

बुद्ध के समय कैसे शुरू हुए बौद्धों के अंदर और बाहर विवाद?

कौशाम्बी के संघाराम में एक बौद्ध अर्हत को किसी नियम के उल्लंघन के बाद उसे स्वीकारने कहा गया, किंतु अर्हत ने गलती नहीं मानी। उन्हें संघाराम से जब निकालने की बात हुई, तो उन्होंने अपना गुट बना लिया। जब संघाराम में लड़ाई ने जोर पकड़ा, तो गौतम बुद्ध को स्वयं आना पड़ा। किंतु उनके समझाने के बाद भी वे नहीं माने। इस प्रकरण से लगता है कि बुद्ध का उनके अनुयायियों पर नियंत्रण भी घटने लगा था। हालाँकि आगे वर्णन है कि गौतम बुद्ध मौन होकर जंगलों की ओर निकल गए, वहाँ की जनता ने इन बौद्ध अर्हतों को भिक्षा देना बंद कर दिया, और अंततः उन्हें संधि करनी पड़ी।

संघ के बाहर विवादों में ब्राह्मणों से विवाद की चर्चा बहुधा की जाती है। बुद्ध के ब्राह्मणों से कई संवाद हैं, और वह सीधा प्रतिकार करते कम दिखते हैं। बुद्ध कहते हैं- 

‘जो सांसारिक मोह त्याग चुके हैं, और संन्यास लेकर ध्यान में लगे हैं, वे मेरी दृष्टि में सच्चे ब्राह्मण है…जैसे-जैसे समाज समृद्ध होता गया, ब्राह्मणों को राज-सुख आकर्षित करने लगा है, और उनके अंदर इच्छाएँ बढ़ने लगी है, यह उनके ब्राह्मण बने रहने में बाधा है’

कुछ स्थानों पर वह आडंबरों पर तंज करते हैं और ऐसे वर्णन हैं कि ब्राह्मणों द्वारा बौद्धों के विषय में शंकाएँ भी फैलायी जाती रही। बुद्ध के अंदर किसी अलौकिक या जादुई शक्ति का अभाव देखा गया, और न ही वह आम जनता की कामनाओं की पूर्ति कर सकते थे। जबकि ब्राह्मणों ने राजा से लेकर जनता तक की इच्छाओं को साधने के लिए भिन्न-भिन्न यज्ञ और विधियों का तंत्र बनाना शुरू कर दिया था। फिर भी, ऐसे ब्राह्मण थे जो बुद्ध को महात्मा मानते थे, और ऐसे राजा भी थे। 

जहाँ मगध नरेश बिंबिसार ने बुद्ध को सहयोग दिया, कोसल नरेश प्रसेनजीत ने उनकी शिष्यता ही स्वीकार ली। ख़ैर, राजाओं के निर्णय राजनीतिक भी होते हैं। प्रजा पर नियंत्रण रखने के लिए वे सभी आस्थाओं को प्रश्रय देते रहते हैं। 

उन्हीं दिनों जिक्र मिलता है एक दस्यु अंगुलिमाल का। यह पाली स्रोतों में किसी चमत्कारी कथा की तरह वर्णित है। ध्वजलिका जंगल में एक डाकू जो अंगुलियों की माला पहन कर घूमता था, वह बुद्ध से प्रभावित हो गया। जब डाकू ने जंगल में बुद्ध को रुकने कहा, तो बुद्ध ने कहा,

‘मैं तो स्थिर हूँ, किंतु तुम कब स्थिर होगे?’

अंगुलिमाल का बौद्ध बनना एक ऐसी घटना थी, जिसमें तमाम पाप करने के बाद भी मुक्ति की संभावना बचती है।  जब अंगुलिमाल श्रावस्ती में भिक्षाटन करने लगा, तो उस पर जनता ने पत्थर बरसाए। कथा में आगे है कि अंगुलिमाल एक गर्भवती महिला को प्रसव में कराहते देखता है, तो बुद्ध उसे कहते हैं—

‘उससे कहो कि तुमने अपने जीवन में कभी किसी जीव की हत्या की चेष्टा नहीं की। तुम बच्चे के स्वस्थ जीवन की कामना करते हो’ 

अंगुलिमाल कहता है कि यह तो सरासर झूठ होगा, मैंने तमाम हत्याएँ की हैं। बुद्ध कहते हैं—

‘तुम्हारा जीवन तभी शुरू हुआ, जब तुमने शील अपनाए। इस जीवन के लिए यह सत्य होगा’

जब गौतम बुद्ध बूढ़े हो रहे थे, महावीर की बहत्तर वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गयी। उनके मृत्यु के ठीक बाद ही जैन श्रमणों के गुट बनने लगे, और आपस में विवाद उत्पन्न होने लगे। आनंद ने इस प्रकरण पर बुद्ध से चिंता व्यक्त की,

‘आपके जीवन में ही हमारे बीच विवाद उत्पन्न होने लगे हैं। आपके बाद क्या होगा? यह अच्छा होगा कि आप अपना उत्तराधिकारी तय कर दें’

समस्या यह थी कि उत्तराधिकारी होगा कौन। जब बुद्ध राजगृह पहुँचे, तो वहाँ उनके ममेरे भाई देवदत्त ने कहा,

‘आप अब बूढ़े हो चले हैं। आपको अब विश्राम की जरूरत है। आप संघ की जिम्मेदारी मुझ पर सौंप दें…’

बुद्ध ने थोड़ी देर सुन कर कहा,

‘देवदत्त! तुमने ऐसा सोचा भी कैसे? मैं सारीपुत्र और मौद्गल्यायन जैसे कुशल लोगों को भी ऐसे नेतृत्व नहीं दे सकता, तुम तो इसके काबिल ही नहीं हो। ऐसी कामना से ही स्पष्ट होता है कि तुम अब मेरे शिष्य नहीं रहे’ 

देवदत्त वहाँ से गुस्से में निकल गया, और मगध के राजकुमार के पास पहुँचा। देवदत्त का चरित्र बाद के वर्षों में एक खलनायक की तरह वर्णित है, जो बुद्ध की हत्या कर धार्मिक सत्ता हासिल करना चाहता था। 

क्या मगध के राजकुमार भी अपने पिता मगध नरेश बिंबिसार की हत्या कर सत्ता हासिल करना चाहते थे? अपनी कामनाएँ त्यागने की शिक्षा देने वाले बुद्ध ने अपने आखिरी दिनों में कामनाओं की पराकाष्ठा देखी। 

जब पिता बिंबिसार को अपदस्थ कर मगध नरेश बने- अजातशत्रु

बौद्धकालीन इतिहास में एक समस्या यह है कि उनका बड़ा हिस्सा बौद्ध या जैन स्रोतों पर आधारित है। उनमें अधिकांश बुद्ध और महावीर के सदियों बाद लिखे गए। लेकिन जब विकल्प कम हों, तो उन्हीं से कल्पना करनी पड़ती है। जैन स्रोत बिंबिसार को जैन आस्था स्वीकारते बताते रहे हैं, जबकि बौद्ध स्रोतों के अनुसार राजा बिंबिसार ने मगध में जैन और बौद्ध दोनों को प्रश्रय दिया। यह दोनों बातें सही हो सकती हैं, क्योंकि बिंबिसार के समय तो दोनों ही फल-फूल रहे थे। बिंबिसार की मृत्यु के बाद क्या? 

अहिंसक बुद्ध के अंतिम दिन अपने करीबियों के साथ हिंसा देखते हुए क्यों बीते? 

बौद्ध ग्रंथ विनय पिटक के अनुसार जब बुद्ध के विद्रोही भाई देवदत्त के भड़काने पर अजातशत्रु अपने पिता बिंबिसार को मारने गए, तो उन्होंने पूछा, ‘तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?’ 

अजातशत्रु ने कहा, ‘मुझे राज चाहिए’

बिंबिसार ने कहा, ‘राज ले लो’

अजातशत्रु ने बिंबिसार को नहीं मारा, किंतु कैद कर लिया। उनसे मिलने की इजाजत मात्र राजमाता (अजातशत्रु की माँ) को थी। उन्हें प्रताड़ित करने के भी विवरण मिलते हैं, और बुद्ध पर प्रश्न उठते हैं कि उन्होंने बिंबिसार की रक्षा के प्रयास क्यों नहीं किए। मगध की जनता पर उनका व्यापक प्रभाव था, तो वह क्या अजातशत्रु को रोक नहीं सकते थे?

ख़ैर, अजातशत्रु जैसे महत्वाकांक्षी राजा को रोकना आसान  नहीं था। अजातशत्रु ने गणराज्य की संरचना को पूर्ण राजतंत्र में बदलना शुरू कर दिया था। सैन्य शक्तियाँ बढ़ा रहे थे, और कोसल नरेश प्रसेनजीत (जो उनके मामा भी थे) से युद्ध छेड़ दी। हालाँकि बाद में इनके मध्य संधि हुई और प्रसेनजीत की बेटी वाजिरा से अजातशत्रु का विवाह हुआ।

इस मध्य अजातशत्रु से गौतम बुद्ध की एक मुलाकात का विवरण है। अजातशत्रु बुद्ध के शांत चित्त से प्रभावित हुए, किंतु बुद्ध स्वयं उनसे शंकित थे। उनके निकलने के बाद बुद्ध ने कहा, 

‘उसने अपने पिता को दुख दिए, प्रताड़ित किया, जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई। उसके लिए धर्म के मार्ग पर चलना कठिन होगा’

आगे की कहानी जो बुनी गयी है, वह कुछ फिल्मी लगती है। हिंसा और षडयंत्रों से भरी। बुद्ध के आँखों के सामने न सिर्फ मगध नरेश बिंबिसार का अंत हुआ, बल्कि उनके अपने शाक्य वंश का संहार भी शुरू हो गया!

बौद्ध कथाओं के अनुसार इस हिंसा का बीज वर्षों पहले जेतवन के वर्षावास में पड़ा था। कोसल नरेश प्रसेनजीत वहाँ स्वयं बौद्ध श्रमणों को भोजन कराने आते थे। सात दिन तक वह नियमित आते रहे, लेकिन तीन दिन नहीं आए। जब वह ग्यारहवें दिन लौटे तो उन्होंने देखा कि मात्र गौतम बुद्ध और आनंद बैठे हैं, बाकी सभी भिक्षाटन पर निकल गए थे। 

प्रसेनजीत के पूछने पर बुद्ध ने कहा, ‘भोजन के लिए वह मात्र आप पर आश्रित क्यों रहें? वह कहीं भी भिक्षा मांगने के लिए स्वतंत्र हैं’

प्रसेनजीत को यह बात चुभ गयी। उन्हें लगा कि यह शाक्य वंशियों का दंभ है। उन्होंने महानामा (बुद्ध के चचेरे भाई) से कहा कि वह किसी शाक्य स्त्री से विवाह करना चाहते हैं। महानामा ने कहा,

‘कोसल नरेश! यह मेरा सौभाग्य होगा। मैं तो अब संन्यासी हूँ। मेरी अपनी बेटी वसभा आपको सौंप रहा हूँ।’

प्रसेनजीत और वसभा के पुत्र हुए विदुदाभ। जब राजकुमार विदुदाभ सोलह वर्ष के हुए तो एक बार अपने ननिहाल कपिलवस्तु गए। वहाँ उन्होंने देखा कि वह जिस स्थान पर बैठे थे, उसे बाद में धोया जा रहा था। वह अचंभित हुए कि ऐसा क्यों किया जा रहा है। तभी उन्हें एक रहस्य का पता चला। उनकी माँ शाक्य-वंशी नहीं, बल्कि महानामा की अवैध संतान थी। एक दासी की पुत्री। 

क्रोधित होकर विदुदाभ ने कहा, ‘इन शाक्यों ने आज मेरा आसन इस कारण धोया कि मेरा रक्त अशुद्ध है। मैं इस आसन को इन शाक्यों के रक्त से धोने का प्रण लेता हूँ!’

शाक्यों का नरसंहार करने और उन्हें आमूल नष्ट करने के लिए विदुदाभ को पहले अपने पिता प्रसेनजीत को रास्ते से हटाना था। उनके जीते-जी यह असंभव था। 

बशर्ते कि वह भी प्रसेनजीत के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा अजातशत्रु ने बिंबिसार के साथ किया। 

शाक्य-वंश को जड़ से मिटा दिया गया। यहाँ तक कि बच्चों को मार दिया गया। फाह्यान ने पाँचवी सदी में कपिलवस्तु के विषय में लिखा कि यह स्थान अब एक मरुस्थल में बदल चुका है, जहाँ बमुश्किल दस परिवार रहते हैं, लेकिन वे शाक्य नहीं हैं। जब सभी शाक्यों को मार डाला गया तो गौतम बुद्ध को क्यों छोड़ दिया गया? यह संभव है कि यह नरसंहार बुद्ध के मृत्यु के बाद ही हुई हो, या यह कि बुद्ध जैसे महात्मा की हत्या किसी राजा के शक्ति से बाहर हो। 

कैसे बीते बुद्ध के आखिरी दिन?

जब विदुदाभ ने स्वयं को कोसल का राजा घोषित कर दिया, तो उनके पिता प्रसेनजीत को भाग कर अजातशत्रु की शरण लेनी पड़ी। वहीं राजगृह में उनकी मृत्यु हो गयी, और उनके भांजे अजातशत्रु ने उनका अंतिम संस्कार किया।

विदुदाभ ने कपिलवस्तु जला कर राख कर दिया, और एक-एक शाक्य को चुन कर मरवा दिया। इस नरसंहार के मध्य उसका श्रावस्ती में गौतम बुद्ध से मिलने का वर्णन है, जब वह बुद्ध से कहता है—

‘आपके लिए उचित होगा कि आप किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएँ’

बुद्ध उत्तर देते हैं,

‘यहाँ मेरे परिजनों की छाया है। इससे सुरक्षित स्थान क्या होगा?’

शाक्य पूरी तरह खत्म हो गए, या पलायित हो गए, यह स्पष्ट नहीं है। बर्मा (म्यांमार) और श्रीलंका, दोनों स्थानों के बौद्ध स्वयं को पलायित शाक्यों का वंशज कहते रहे हैं। बुद्ध के भाई महानामा, जो विदुदाभ के नाना भी थे, ने प्रायश्चित में आत्महत्या कर ली। बुद्ध के पट-शिष्य सारीपुत्र की मगध में स्वाभाविक मृत्यु हो गयी। दूसरे शिष्य मौग्दल्यायन की संदिग्ध हत्या कर दी गयी। 

अपने कुल और अपने शिष्यों की मृत्यु के बाद बूढ़े गौतम बुद्ध अकेले पड़ गए थे। मात्र उनके भाई आनंद बच गए थे। वह श्रावस्ती से अंतिम यात्रा पर चल पड़े। वहीं जहाँ से उनकी यात्रा शुरू हुई थी— राजगृह।

बुद्ध के आखिरी दिनों का वर्णन सबसे बृहत है, जो ‘महापरिनिरबान सुत्त’ कहलाता है। सभी सांसारिक इच्छाओं और मोह से मुक्त। राजगृह में जो स्थान उन्होंने चुना, वह एक पहाड़ी थी— ‘गिद्ध-कूट’ यानी जहाँ गिद्ध बसते है।

अस्सी वर्ष के बुद्ध दुर्बल हो गए थे, लेकिन अब भी नियमित भिक्षाटन के लिए लंबी यात्रा करते थे। यहाँ अजातशत्रु की भूमिका गौर करने लायक है। भले उनकी छवि क्रूर पितृहंता की हो, वह गौतम बुद्ध का सम्मान करते थे।

जब अजातशत्रु ने पड़ोसी वृज्जि (वैशाली) महाजनपद पर आक्रमण की योजना बनायी, तो अपने दूत वसक्कर को कहा— 

‘तुम तथागत से मिलो और उनसे पूछो वृज्जि की शक्ति क्या है’

वसक्कर ने चौंक कर पूछा, ‘इसका उत्तर वह क्यों देंगे?’

अजातशत्रु ने कहा, ‘तथागत जो भी कहेंगे, वह सत्य ही होगा’

जब वसक्कर बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन उन्होंने आनंद से पूछा,

‘क्या अब भी वृज्जि वासी नियमित मिलते है? क्या अब भी वे एक-दूसरे की सहायता करते हैं? क्या अब भी एक समुदाय की तरह रहते हैं?’

वसक्कर ने जब अजातशत्रु को यह संवाद बताया, तो वह मुस्कुरा उठे। उन्हें बुद्ध के शब्दों में अपना सत्य मिल गया था। वृज्जियों पर विजय के लिए आवश्यक था उनके समुदाय को तोड़ना, यानी फूट डालना। अजातशत्रु वृज्जि के गणों में विवाद उत्पन्न करने की कूटनीति करने लगे, और साथ ही अपनी सेना तैयार करने लगे। 

युद्ध की तैयारियाँ देख कर बुद्ध ने राजगृह त्याग कर आगे बढ़ने का निर्णय कर लिया। वह गंगा नदी के किनारे एक ग्राम पहुँचे- पाटलीगाम। वहाँ वह गाँव वालो को बैठ कर शिक्षा देते, और भिक्षाटन पर निकल जाते। कुछ दिनों बाद उस ग्राम में भी किलाबंदी होने लगी। जब बुद्ध को मालूम पड़ा कि अजातशत्रु की सेना वृज्जि पर आक्रमण के लिए इस ग्राम में ऊँची दीवारें बना रही है, उन्होंने कहा,

‘संभव है कि इस ग्राम का भविष्य वैभवशाली हो, और यह भविष्य में एक महानगर बने, किंतु एक दिन इस नगर की भी दुर्दशा तय है। चाहे वह अग्नि से हो, आक्रमण से हो, या दुराचार से’

बुद्ध यह कह कर एक नाव में बैठ गंगा नदी पार कर गए। पाटलीगाम भविष्य में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र कहलाया, और आज बिहार की राजधानी पटना कहलाता है। 

संघाराम में महिलाओं की उपस्थिति बुद्ध के समय कुछ कम थी। उन्हें उस समय थेरी या भिक्षुणी कहा जाता था या नहीं, यह  भी स्पष्ट नहीं। एक विवरण है आनंद बुद्ध से सीधा प्रश्न करते हैं कि क्या स्त्रियों को भी निर्वाण मिल सकता है। जब बुद्ध ‘हाँ’ कहते हैं तो वह पूछते हैं कि आप महिलाओं को संघाराम में सम्मिलित होने की अनुमति क्यों नहीं देते। इस संवाद से लगता है कि बुद्ध को भी यह स्वीकारने में कुछ समय लगा, और उनके वृद्धावस्था में ही महिलाएँ सम्मिलित हो सकी। ख़ास कर जब बुद्ध वैशाली आए। 

कौन थी अम्बपाली और किसे बनाया बुद्ध ने अपना उत्तराधिकारी? 

पाटलीगाम (पटना) से गंगा पार कर बुद्ध कोटगाम और नादिका के रास्ते वृज्जि राजधानी वैशाली पहुँचे। ध्यान रहे कि जब बुद्ध मगध छोड़ कर वृज्जि आए, उस समय मगध नरेश अजातशत्रु वृज्जि पर आक्रमण करने वाले थे। यह राजनीतिक उथल-पुथल का समय था। 

अम्बपाली वैशाली की सबसे धनी और चर्चित गणिका थी, जिन्हें प्रसिद्ध हिंदी उपन्यास में नगरवधू कहा गया है। वह बुद्ध की प्रशंसक थी, और उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को रहने के लिए एक भवन भी दिया था। गौतम बुद्ध का स्वागत वहीं हुआ।

उस समय तक अम्बपाली भी बूढ़ी हो चली थी। उन्होंने न सिर्फ बुद्ध के अनुयायियों की सेवा की, बल्कि उन्होंने स्वयं बौद्ध बनने का निर्णय ले लिया। यह पहला नाम सहित वर्णन है जब संघाराम में एक महिला जुड़ी, और वह भी ऐसी महिला जो वैशाली की सबसे प्रसिद्ध गणिका रही थी।

बुद्ध अब धीरे-धीरे कमजोर हो रहे थे। उन्हें भी आभास था कि मृत्यु निकट है। वह वैशाली के निकट ही एक गाँव में रहने चले गए, जहाँ उनके साथ मात्र आनंद रहते थे। बुद्ध का कथन वर्णित है—

‘मेरे लिए इस तरह अपने शिष्यों को छोड़ कर जाना उचित नहीं होगा। भविष्य के लिए उनसे एक अंतिम संवाद आवश्यक है। मुझे अपने रोगों से लड़ना होगा और जीवम् वापस लाना होगा…किंतु आनंद! तुम्हें अब मुझ पर आश्रित होना छोड़ कर सत्य पर आश्रित रहना होगा। मैं चाहे कमजोर हो जाऊँ या दुनिया छोड़ दूँ, सत्य सदैव शक्तिशाली रहेगा’

उन्हीं दिनों बुद्ध ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा,

‘अब आप लोगों को किसी बुद्ध की, किसी गुरु की, या किसी प्रतिनिधि की आवश्यकता नहीं। किसी साथी की नही, न ही किसी मार्गदर्शक की। अब इस दुनिया के अंधेरे का प्रकाश आपको स्वयं बनना होगा…अप्प दीपो भव’

इन वर्णनों से लगता है कि बुद्ध किसी को भी अपना उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा नहीं रखते थे। वह पहले भी ऐसे प्रस्तावों को ठुकरा चुके थे, जैसे देवदत्त के प्रस्ताव को। बुद्ध का एक आत्म-संवाद भी वर्णित है, जो उन्होंने काल्पनिक ‘मारा’ राक्षस से किया, जब मारा ने कहा,

‘आप तब तक नहीं मर सकते, जब तक आप अपने समुदाय को संगठित कर आगे का मार्ग स्पष्ट न कर दें’

बुद्ध ने कहा, ‘इसकी कोई आवश्यकता नहीं। अब मेरी अंतिम यात्रा का समय है’

मारा ने पूछा, ‘परिनिर्वाण?’

बुद्ध ने मुस्कुरा कर कहा, ‘हाँ! ठीक तीन महीने बाद’

वर्षावास खत्म होते ही बुद्ध ने आखिरी बार वैशाली नगर की ओर मुड़ कर देखा और कहा, ‘इस सुंदर नगरी को मैं अंतिम बार देख रहा हूँ’

बुद्ध वृज्जि से निकल कर मल्ल महाजनपद की ओर बढ़े। मानचित्र देख कर लगता है कि बुद्ध वापस कपिलवस्तु की ओर लौट रहे थे, लेकिन ऐसे अनुमान लगाना व्यर्थ है। पावा ग्राम में एक समृद्ध लुहार रहते थे— चुंडा। 

परिनिर्वाण से पूर्व बुद्ध का अंतिम भोजन उन्हीं के घर होना था। 

बुद्ध का अंतिम भोजन क्या था, इस पर विवाद होते रहते हैं। पाली शब्द ‘सूकरमद्दव’ को सूअर का मांस माना जाए या कुकुरमुत्ता, इस पर बौद्ध भी एकमत नहीं है। जाहिर है कि शाकाहार के समर्थक इस अंतिम भोजन को शाकाहार मानते हैं। लेकिन यह विवाद बहुत महत्व नहीं रखता, क्योंकि ऐसे कई दृष्टांत है जब भिक्षा में मांस मिला। इसलिए ऐसा कोई बंधन नहीं था। यह मान लेने में हर्ज नहीं कि अंतिम भोजन मांस रहा हो। 

कैसे हुई बुद्ध की मृत्यु और क्या था परिनिर्वाण?

मल्ल राज्य में पहुँच कर बुद्ध एक आम के बगीचे में रुके, जो चुंडा लुहार का था, और वहाँ पहले से बौद्ध श्रमण रुके हुए थे। बुद्ध पहले भी वहाँ आ चुके थे। उन दिनों लोहे का काम करना समृद्धि की निशानी थी, और विशेष कर यह इलाका व्यापार के रास्ते पर था, इसलिए चुंडा कोई गरीब व्यक्ति नहीं थे। पावा गाँव, जो कुशीनगर के निकट था, वहाँ जंगली सूअर बहुतायत थे। चुंडा ने अगले दिन चावल और सूअर का माँस (सूकरमद्दव) बनाया।

यहाँ आनंद की स्मृति वर्णित है कि बुद्ध ने कहा,

‘मुझे यह मांस दीजिए, लेकिन मुझे देने के बाद जो भी मांस बचे, वह मिट्टी में गाड़ दें। बाकी श्रमणों को यह भोजन न दें’

बुद्ध से जुड़े संस्मरणों में ऐसे कई कथन हैं, जिसका भावार्थ स्पष्ट नहीं है। जैसे इस कथन से लगता है कि बुद्ध को इस मांस से अस्वस्थ होने की आशंका थी, वहीं भिक्षा अस्वीकार नहीं करना चाहते थे। इस कारण उन्होंने स्वयं तो खाया, किंतु उसके बाद इसे मिट्टी में डाल देने कहा।

आगे वर्णित है कि बुद्ध को शीघ्र ही भीषण पीड़ा हुई और मल में रक्त निकलने लगा। लेकिन, बुद्ध ने आनंद से कहा,

‘मुझे इस नहर से थोड़ा जल लाकर दो, लेकिन मेरी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई। मुझे आगे जाना ही होगा’

आनंद ने उस नहर की ओर देख कर कहा, ‘इसका जल यहाँ से गुजरती बैलगाड़ियों के कारण मैला पड़ गया है। हम कुकुट्ठ नदी की ओर बढ़ते हैं’

बुद्ध ने कहा, ‘मुझे अभी यही जल लाकर दो’

थोड़ी देर बाद कुकुट्ठ नदी में नहा कर बुद्ध वापस चुंडा के बगीचे में ही लौट आए।

वहाँ से शाम को वह पुनः यात्रा पर निकले। हिरन्यवती नदी पार कर वह कुशीनगर पहुँचे। यह मल्ल महाजनपद का प्रसिद्ध नगर था। वहाँ पूरब से पश्चिम तक कतार में साल के पेड़ लगे थे। बुद्ध चलते-चलते थक गए थे। वह दोनों पेड़ों के बीच उत्तर की तरफ सर रख कर लेट गए।

आनंद ने देखा कि बुद्ध का शरीर सफेद पड़ता जा रहा है। ऐसा परिवर्तन इससे पहले निर्वाण के समय देखा गया था। हालाँकि शरीर का सफेद पड़ना चिकित्सक की नजर से देखा जाए, तो इसका स्वाभाविक अर्थ निकलता है, लेकिन आनंद की दृष्टि में यह परिनिर्वाण का चिह्न था।

आनंद ने कहा, ‘आपकी मृत्यु चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, कौशाम्बी, साकेत या वाराणसी में होती, तो यहाँ आपको देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती। इस साधारण नगर में ही क्यों?’

बुद्ध ने कहा, ‘मेरे लिए यह साधारण स्थान नहीं है। यह मेरी मुक्ति का स्थान है’

मल्ल परिवारों से लोग जुटने लगे थे। वहीं से गुजर रहे एक मुसाफिर सुबद्ध का जिक्र है, जिन्होंने भीड़ देख कर पूछा कि कौन हैं। जब पता लगा कि बुद्ध हैं, तो उन्होंने पास आकर तंज की तरह पूछा,

‘क्या आपको मुक्ति मिल जाएगी? क्या किसी को आज तक मिली है?’ 

बुद्ध ने कहा, 

‘सुबद्ध! मैंने 29 वर्ष की अवस्था में इस मार्ग पर चलना शुरू किया। पचास वर्षों तक बिना रुके चलता रहा। तुम यदि सत्य के मार्ग पर चलते रहोगे, तो यह संभव है कि मुक्ति मिलेगी। किंतु मुक्ति की कामना करना व्यर्थ है’

सुबद्ध उनके अंतिम शिष्य बने। उसके बाद बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा कि वह आँखें बंद कर ध्यान करना चाहते हैं। 

कुशीनगर के साल वृक्षों की छाया में बुद्ध का यह अंतिम ध्यान था, जिसके बाद उनकी आँखें नहीं खुली।

प्राचीन मगध और बुद्ध का निर्वाण स्थल बोधगया अब बिहार राज्य में है। बिहार, जिस शब्द की उत्पत्ति बौद्ध ‘विहार’ से बतायी जाती है। यह राज्य अब अपना प्राचीन वैभव काफी हद तक खो चुका है। बुद्ध और महावीर के मूल चिह्न नगण्य बचे हैं। बोधिवृक्ष के विषय में कहा जाता है कि वह कई बार काटा गया। 1881 ईसवी में श्रीलंका से आयातित कर एक वृक्ष रोपा गया, जो मूल बोधिवृक्ष का अवशेष कहलाता है। यह बात पूर्णतया अवैज्ञानिक लगती है कि पाँच सदी ईसा पूर्व का एक वृक्ष अब तक किसी भी रूप में जीवित है।

बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद बौद्ध मतावलंबियों ने क्या किया?

थेरगाथा में आनंद का कथन है कि बुद्ध के बाद जैसे अंधेरा छा गया। उन्होंने अपने भाई अनिरुद्ध और अन्य अनुयायियों के साथ मिल कर कुशीनगर में अंतिम संस्कार की तैयारी की। उनके शरीर को लपेट कर सात दिनों तक रखा गया, और आठवें दिन शवदाह किया गया (हालाँकि यह प्रक्रिया असामान्य लगती है कि सात दिन बुद्ध का शरीर रखा गया)। यह भी वर्णित है कि उनकी अस्थियों को पाने के लिए मल्ल समुदाय में लगभग युद्ध छिड़ गया, और बहुत समझा-बूझा कर ही शांत किया गया।

बुद्ध की कुछ अस्थियों को कुशीनगर में ही एक स्तूप बना कर रखा गया। कुछ को राजगृह, कपिलवस्तु, वैशाली, लुंबिनी, सारनाथ और बोधगया ले जाया गया। चूँकि बुद्ध ने किसी को उत्तराधिकारी नहीं नियुक्त किया था, इसलिए जल्द ही विवाद भी उत्पन्न होने लगे। उस समय सबसे वृद्ध अर्हतों में एक महाकश्यप और अन्य ने पहला सम्मेलन (परिषद) आयोजित किया। 

पहला परिषद राजगृह के निकट गिद्ध-कूट के वर्षावास में था। उपाली नामक एक हजाम (नाई) बौद्ध अर्हतों के बाल मुंडन किया करते थे, और उन्हें संघाराम के जीवन का बृहत ज्ञान था। महाकश्यप ने उन्हें ही बुद्ध के बताए गए नियमों को प्रस्तुत करने कहा। उसके बाद आनंद ने अपनी तीक्ष्ण स्मृति से बुद्ध की शिक्षा और संस्मरणों को सामने रखा, जिसे अन्य लोगों ने दोहराया। माना जाता है कि यहाँ से शुरू हुई श्रुति परंपरा के आधार पर ही बाद में पाली ग्रंथ लिखे गए।

लिखित रूप में विनय पिटक का संग्रह करने में सदियाँ लग गयी। माना जाता है कि इसमें आनंद के मुख से सत्रह हजार कथन-संस्मरण आदि सम्मिलित किए गए। लेकिन जैसा पहले वर्णित है, लिखने का कार्य आनंद के समय नहीं हुआ। हालाँकि एक पुरान नामक श्रमण की चर्चा भी है, जिन्होंने कहा कि वह आनंद के कथनों को नहीं मानते, क्योंकि बुद्ध स्वयं उन्हें शिक्षा दे चुके हैं। इससे लगता है कि ऐसे कई अन्य श्रमणों ने भी अपनी-अपनी स्मृतियाँ आगे हस्तांरित की होगी। 

बुद्ध के लगभग एक सदी बाद (300-260 ईसा पूर्व) पहला स्पष्ट मतभेद भी हो गया। इसे रूढ़िवादी बूढ़ों और नयी पीढ़ी के उदारवादियों का मतभेद कहा जा सकता है। रूढ़िवादी जो बुद्ध के नियमों का सख्ती से पालन करने पर बल देते, वे कहलाए ‘स्थावरवादी’। वहीं जो लोग नियमों में कुछ छूट लेने और समाज में व्यापक विस्तार में भरोसा करते थे, वे कहलाए ‘महासांघिक’। जाहिर है कि बहुमत महासांघिक निकाय की ही थी। 

इसके बाद इन दोनों बड़ी शाखाएँ से कई शाखाएँ निकलती गयी, जो अब अठारह से अधिक हो चुकी है। बुद्ध ने आठ मुख्य मार्ग बताए थे, जो अब तिब्बती मान्यताओं के अनुसार चौरासी हजार मार्ग बन चुके हैं। हालाँकि इतनी शाखाएँ और मार्ग निकलने का एक अर्थ यह भी है कि बुद्ध को समझना कठिन था। उनके एक कथन के कई अलग-अलग अर्थ हो सकते थे। अन्यथा इतने भिन्न-भिन्न मत क्यों होते?

जैसे इसी प्रश्न पर अगर वापस लौटें कि बुद्ध दिखते कैसे थे। जब बुद्ध के कथनों को लिखा ही सदियों बाद गया, तो उनकी छवि या मूर्ति को पहली बार कब और कैसे बनाया गया होगा। क्या आनंद या किसी श्रमण ने मूर्तिकार के साथ बैठ कर वह पहली मूर्ति बनवायी होगी? अगर बनवायी भी होगी, तो वह हमारे पास अब उपलब्ध नहीं। 

मुझे दो साल पहले बुद्ध की उपलब्ध प्राचीनतम मूर्ति देखने का अवसर मिला। भारत में नहीं, बल्कि लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में। यह मूर्ति दूसरी-तीसरी सदी में बनी थी, और वर्तमान पाकिस्तान (प्राचीन गंधार) के जमाल गढ़ी में मिली। 

कालांतर में मूर्तिकारों ने बुद्ध की यह शक्ल-सूरत भी धीरे-धीरे बदल दी, या यूँ कहें कि अपने-अपने अर्थों से बुद्ध की छवि भी भिन्न-भिन्न बनती गयी। 

सम्राट अशोक की चर्चा के बिना बुद्ध की चर्चा पूरी नहीं हो सकती। भले यह बुद्ध के परिनिर्वाण के डेढ़ सौ वर्ष बाद बुद्ध से जुड़ते हैं, लेकिन यह बहुत ज्यादा वक्त भी नहीं है। अगर उनके समय बुद्ध के लिए तमाम स्तूप, शिलालेख, विहार और स्तंभ बनाए गए, जो आज तक मौजूद हैं, तो इसके दो स्पष्ट अर्थ निकलते हैं— पहला कि बुद्ध नामक व्यक्तित्व वास्तव में थे, और दूसरा कि बुद्ध का प्रभाव उनके जाने के बाद बढ़ता ही गया। क्योंकि इतना प्रभाव तो बुद्ध के समकालीन बिंबिसार और अजातशत्रु पर भी नहीं पड़ा था। 

बुद्ध के प्रचार में क्या भूमिका रही सम्राट अशोक की?

बुद्ध के बाद अजातशत्रु और उनके वंशजों उदयन आदि ने वृज्जि, कोसल और गंगा दोआब के बड़े क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया। उनके वंश के बाद यह सिलसिला नंद वंश और चंद्रगुप्त मौर्य तक चलता रहा, जब पाटलिपुत्र से वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान तक उनका परचम लहरा रहा था। इतना बृहत राज्य भारतीय इतिहास में कम ही शासकों के समय हुआ। यह सब बुद्ध के बाद महज एक सदी में हो गया। 

272 ईसा पूर्व में, यानी बुद्ध के 132 वर्ष बाद चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र अशोक गद्दी पर बैठे। उन्होंने 41 वर्षों तक शासन किया। अशोक एक महत्वाकांक्षी शासक थे, जिन्होंने गद्दी पाने के पहले जहाँ अपने भाइयों को रास्ते से हटाया, वहीं गद्दी पर बैठने के बाद अन्य राज्यों से लड़ाइयाँ लड़ी। उन्हीं में से एक कलिंग-युद्ध के भीषण रक्तपात के बाद उनका हृदय-परिवर्तन तेरहवें अभिलेख (पेशावर, वर्तमान पाकिस्तान) में वर्णित है। इस अभिलेख में अशोक स्वयं को पियदस्सी (प्रियदर्शी) कहते हैं- 

‘आठ वर्षों से अभिषिक्त देवों के प्रियदर्शी राजा ने कलिंग पर विजय पायी। डेढ़ लाख प्राणी बन्दी बना लिये गये, एक लाख वहाँ घायल हुए; तथा उससे भी अधिक संख्या में मरे…तत्पश्चात् अब कलिंग विजय पर देवों के प्रिय की धर्मवाय, धर्मकामना और धर्मानुशासन तीव्र हुई। कलिंग के विजेता देवों के प्रिय को पश्चाताप है।’

इस अभिलेख में बारंबार देवन प्रियस (देवों के प्रिय) कहा गया है, किंतु इस अभिलेख से यह स्पष्ट नहीं है कि यहाँ बुद्ध की बात की जा रही है। ‘धम्म’ का प्रयोग कई बार होने से यह अनुमान लगता है, किंतु धर्म भी व्यापक शब्द है। एक अन्य अभिलेख में अशोक सभी पंथों के मध्य सहिष्णुता की बात करते हैं। बुद्ध का नाम स्पष्ट रूप से आता है लुंबिनी के रुम्मिनदेई अभिलेख में, जहाँ लिखा है—

‘राज्याभिषेक के बीस वर्ष बाद देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा यहाँ स्वयं आकर पूजा की गयी क्योंकि यहीं बुद्ध शाक्यमुनि जन्म लिये थे। यहाँ पत्थर की दृढ़ दीवार बनवायी गयी एवं शिला-स्तम्भ खड़ा किया गया, क्योंकि यहाँ भगवान बुद्ध उत्पन्न हुए थे। अतएव लुम्बिनी ग्राम को करमुक्त किया गया’

यह छोटा अभिलेख एक अकाट्य प्रमाण की तरह है कि शाक्यमुनि बुद्ध की पूजा के लिए अशोक आए थे। हालाँकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि अशोक मात्र बुद्ध के ही आराधक थे। यदि ऐसा होता तो अशोक के सभी चौदह प्रमुख अभिलेखों में बुद्ध की चर्चा होती, या किसी भी रूप में नाम होता, जबकि ये अभिलेख नैतिक मापदंडों पर केंद्रित हैं। ‘धम्म’ (धर्म) का पालन एक नैतिक जीवन जीना भी हो सकता है। 

इसलिए यह मानना कि अशोक के समय राज्य की हर चौहद्दी तक बहुसंख्यक बौद्ध मत मानने लगे थे, या बल-पूर्वक पंथ-परिवर्तन हुआ था, यह अतिशयोक्ति होगी। यह अवश्य हो सकता है कि स्तूपों और विहारों के माध्यम से बौद्ध मतावलंबियों की गुणात्मक वृद्धि हुई, और इसके चिह्न अशोक के बाद भी सदियों तक मिलते रहे। बौद्ध आज भी अशोक के काल को अपना स्वर्ण-युग मानते हैं। उस काल में बना सांची का स्तूप आज भी मजबूती से खड़ा है।

सांची के स्तूप में उकेरे गए बुद्ध के जीवन-चरित से एक सशक्त परंपरा की शुरुआत होती है। उस परंपरा में बुद्ध का व्यक्तित्व एक मनुष्य से उठ कर देवत्व की ओर बढ़ता चला जाता है। जातक-कथाओं से लेकर पाली ग्रंथों की माला तैयार होने लगती है। पहली सदी में ‘महावस्तु’ रचा गया, दूसरी सदी में अश्वघोष ने ‘बुद्धचरित’ रचा, और ‘ललितविस्तार’ तक आते-आते तुषित स्वर्ग और बुद्ध की लीलाओं के विवरण आने लगे।

इन रचनाओं के साथ-साथ निर्वाण के तीन यान भी उभरने लगे- महायान, हीनयान, और छठी सदी तक आते-आते…वज्रयान!

Author Praveen Jha narrates a commentary based on book Gautam Buddha by Vishwapani Blomfield. 

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