रोम 4- इटली में पिज़्ज़ा नहीं खाते

Rome Poster 4
दुनिया के तमाम इतालवी रेस्तराँ में जो भोजन मिलता है, वह ज़रूरी नहीं कि इटली के लोग भी प्रतिदिन खाएँ। जैसे भारतीय रेस्तराँ के लोकप्रिय भोजन भी भारतीय दिनचर्या के भोजन नहीं होते।

खंड 3 पर जाने के लिए क्लिक करें

पहले खंड पर जाने के लिए क्लिक करें 

रोम की सैर पैदल ही हो सकती है। सदियों से शहर के ऊपर शहर बनते हुए इसकी गलियाँ इतनी सँकरी रह गयी कि गाड़ियों चलनी दूभर है। छोटी-छोटी गाड़ियाँ जैसे-तैसे गुजर पाती हैं, मगर गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं मिलती।

‘यहाँ नयी गाड़ी ख़रीदने का मतलब नहीं। रोम में ऐसी कोई गाड़ी नहीं मिलेगी जो ठुकी हुई न हो’, 

यह बात मुझे एक व्यक्ति ने उस वक्त कही जब हमारे सामने बड़े आराम से एक गाड़ी ठोकी जा रही थी।

‘ऐसा तो दिल्ली के बारे में कहते हैं। मगर वहाँ की सड़कें चौड़ी हैं’, मैंने कुछ तन कर कहा

दिल्ली की सड़कें चौड़ी हैं, मगर प्रदूषण भी तो है। रोम की भीड़-भाड़ और के बावजूद अगर साँस लेने की वजह है, वह शायद यही कि गाड़ियों की जगह कम है। आदमी करे तो क्या करे, सिवाय पैदल चलने के?

पैदल चलने की एक और वजह है कि हर दो सौ मीटर पर कुछ रुक कर देखने को मिल जाता है। जो टूरिस्ट हॉप-ऑन हॉप-ऑफ बसे हैं, वे भला कहाँ-कहाँ रोकें? कोलोसियम से दो कदम पर रोमन फोरम, फोरम से दो कदम पर वे पुराने मंदिर। उससे दो कदम पर वह घुड़सवारी का मैदान। उससे दो कदम पर वह टीला जहाँ से गिरा कर मारने की सजा दी जाती थी। तमाम संग्रहालय, गिरजाघर, रोमन स्नानागार, वैटिकन सब एक के बाद एक बिखरे पड़े हैं। जो खूब चल सकता है, वही रोम देख सकता है।

आखिर थक कर मैं एक इतालवी रेस्तराँ में दाखिल हुआ। नाम था- ‘नीरो’। एक बदनाम बादशाह के नाम पर एक मशहूर रेस्तराँ जो टाइबर नदी के ठीक किनारे था। मैंने इटली के बाहर तमाम इतालवी रेस्तराँ में भोजन किए हैं। परमीसान, रिसोत्तो, पास्ता, लासान्या, कल्जोन आदि खा चुका है। हालाँकि एक समय ऐसा भी था, जब इतालवी का मतलब सिर्फ़ पिज़्ज़ा समझता था। बाद में पता लगा कि यह रोम के गरीबों का भोजन था। वे बची-खुची, अमीरों की फेंकी गयी सब्जियाँ उठा कर बनाया करते थे। 

एक दिन पिज़्ज़ा की किस्मत बदल गयी जब यह इटली की एक महारानी की थाल में पहुँच गयी। उन महारानी को यह चीज इतनी भायी कि उन्होंने इसे शाही व्यंजन बनाने का हुक्म दे दिया। उन महारानी का नाम था मार्गरीटा, और उन्हीं के नाम पर मशहूर मार्गरीटा पिज़्ज़ा तैयार होने लगा। 

बहरहाल क्या आप जानते हैं कि भारत के एक गाँव (अब नगर) का नाम भी उन्हीं के नाम पर पड़ा- मार्गरीटा!

खैर, ये तमाम पास्ता-पिज़्ज़ा आदि इतालवी भोजन के शो-पीस मात्र हैं। कई इतालवी स्वयं वही पसंद करते हैं जो भारत के जैन भोजनालयों में मिलता है। हरी सब्जियाँ। बैगन के तो इतने लज़ीज़ इंतज़ामात हैं कि क्या कहें। बैगन को वह कहते हैं- मेलांज़ाने। इसे तल कर, सेंक कर, चीज़ में पका कर, परमीसान के साथ डाल कर, और न जाने क्या-क्या कर पकाते रहते हैं। माँस का भी शौक है, मगर कम से कम दक्षिणी इटली में हरी सब्जियों ने अपना अच्छा-ख़ासा दबदबा बना रखा है।

इटली यूरोप के उन जगहों में भी है, जहाँ भैंसे खूब पाली जाती है। मोज़ारेल्ला भी भैंस के दूध का ही बनता है। यह कहना कठिन है कि यहाँ भैंसे कब और कैसे आयी, मगर इटली में उनकी इज़्ज़त गाय से कुछ ज्यादा ही कही जाएगी।

मैं रोम की भीड़-भाड़ से निकल कर उस जगह निकल पड़ा जिसे दुनिया की इंस्टाग्राम राजधानी कहा जाने लगा है। वह जगह अपनी ख़ूबसूरती के लिए तो मशहूर है ही, मगर वहाँ की ख़ासियत है- नींबू। जिधर देखो, उधर नींबू। बड़े-बड़े पीले रंग के नींबू पहाड़ों पर लटके पड़े हैं। यहीं से पूरी दुनिया में जा रहे हैं। वे कहलाते हैं- अमाल्फी नींबू। 

आगे की कहानी खंड 5 में 

In Part four of Rome series, Author Praveen Jha narrates about Italian food habits. 

Eggplant Italian Food
दक्षिण इटली के आम जीवन में हरी सब्ज़ियाँ और ख़ास कर बैगन लोकप्रिय है
1 comment
  1. पिज़्ज़ा गरीबों का भोजन रहा होगा, पर शायद अब अमीर ही इसे खाने का शौक पालते होंगे। वैसे, पहली बार जब मैंने इसे चखा था तो मन में यही खयाल आया था कि यह क्या बकवास व्यंजन है, ऊपर से इतना महंगा। फिर कुछ टेस्ट डेवलप हुआ और कुछ इंडियन मसाला और अचारी किस्में लोगों ने बनाना शुरू किए तो पसंद भी आने लगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like
Kindle book hindi poster
Read More

किंडल पर पुस्तक कैसे प्रकाशित करें?

किंडल पर पुस्तक प्रकाशित करना बहुत ही आसान है। लेकिन किंडल पर किताबों की भीड़ में अपनी किताब को अलग और बेहतर दिखाना सीख लेना चाहिए। इस लेख में अमेजन किंडल पर पुस्तक प्रकाशित करने की प्रक्रिया
Read More
Rome part 1 poster
Read More

रोम 1 – मलबों का शहर

रोम की ख़ासियत कहें या उसका ऐब कि उस शहर से मलबे और भग्नावशेष उठाए नहीं गए। वे शहर के केंद्र में अपनी उम्र के झुर्रियों के साथ मौजूद हैं। चाहे नीरो के जीर्ण-शीर्ण भवन हों, या वैटिकन मूल्यों से पेगन मंदिर, वे अब भी झाँक रहे हैं। इस आधुनिक मुर्दे के टीले की कहानी इस संस्मरण में
Read More
Nalasopara Chitra Mudgal
Read More

एक किन्नर की चिट्ठी अपने माँ को

कुछ किताबें दिल-ओ-दिमाग में एक गहरी छाप छोड़ जाती है। चित्रा मुद्गल लिखित पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा एक लाइफ़-चेंजिंग किताब के खाँचे में बैठती है।
Read More