खंड 2 पर जाने के लिए क्लिक करें
पहले खंड पर जाने के लिए क्लिक करें
यह कहना कि ईसाइयों ने क्रूरता से सभी रोमन प्रतीक तोड़ दिए, एक अर्धसत्य है। इसके लिए बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं। जहाँ रोमन मंदिरों के भग्नावशेष हैं, वहाँ से अगर एक पत्थर फेंके तो एक आयताकार मैदान में जाकर गिरेगा। यह किसी रनिंग ट्रैक जैसा लगता है, जहाँ धावक दौड़ते होंगे। इसके चारों तरफ़ दर्शकों के बैठने की सीढ़ियाँ भी है। लगभग दो लाख रोमन बैठ कर यहाँ दौड़ देखते थे।
मगर यहाँ धावक नहीं बल्कि रथों की दौड़ होती थी। यह घुड़दौड़ का मैदान था। यह मैदान भी दो हज़ार वर्षों से अब तक क़ायम है। हालाँकि उसके एक छोर पर आधुनिक साउंड सिस्टम लग रहे थे, और नव वर्ष के आयोजन की तैयारी चल रही थी। अब कहाँ रथों की दौर होगी!
इसी मैदान ‘सर्कस मैक्सिमस’ में ईसाइयों का सामूहिक नरसंहार किया गया था।
इसके ठीक सामने एक भग्न राजमहल है, जिसकी मुंडेर पर बैठे रोमन राजा नीरो ने उन्हें मारने का आदेश दिया था। इन ईसाइयों पर आरोप था कि उन्होंने रोम नगर में आग लगा दी, और उनकी वजह से रोम जल कर ख़ाक हो गया। जिन ईसाइयों को गोलबंद कर मारा गया, उसमें यीशु मसीह के शिष्य संत पीटर भी थे।

उन दिनों ईसाइयों को रोम में बसने की इजाज़त नहीं थी। वे टाइबर नदी पार रहा करते थे। वहाँ एक मैदानी ईसाई बस्ती थी, जिसे राख कर दिया गया। ईसाइयों को ढूँढ-ढूँढ कर मारा गया। मगर ईसाई खत्म नहीं हुए। वे छुप-छुप कर धर्म प्रचार करते रहे। आखिर समय का चक्र पलटा।
जहाँ संत पीटर को सूली पर चढ़ाया गया, वहीं उनके नाम से एक गिरजाघर बना। बहिष्कृत दंडित ईसाई बस्ती अब वैटिकन सिटी कहलाती है। संत पीटर के अनुयायी पोप कहलाते हैं। रोम में अब इतने गिरजाघर हैं कि गिनते-गिनते थक जाएँ। दूसरी तरफ़, नीरो और उनके वंशजों के महल और मंदिर टूट चुके हैं।
टाइबर नदी के किनारे ही एक और मटमैली सी वृत्ताकार इमारत है। यह रोमन राजा हैड्रियन का समाधि स्थल था। इसके गर्भ में हैड्रियन की अस्थियाँ होंगी। मगर इसके ऊपर गिरजाघर बना दिया गया। अब यह संग्रहालय का रूप ले चुका है। इसे ग़ौर से देखने पर यह बात स्पष्ट नज़र आती है कि इसका आधा हिस्सा एक मक़बरा और आधा एक गिरजाघर है। यह कैसल सांत एंजेलो नामक महल और पैंथियन मंदिर-गिरजाघर रोम के ईसाईकरण के प्रतीक हैं।

मैं यह देखने गया कि आखिर वैटिकन सिटी में क्रिसमस की कैसी रौनक होती है। क्या उत्सव होता है। मैं अलग-अलग ईसाई देशों में लंबे समय रहा हूँ, और वहाँ क्रिसमस से अधिक सन्नाटा किसी पर्व में नहीं होता। यह दिन लोग अपने घरों में रह कर अपने परिवार के साथ मनाते हैं। शहर तो बंद पड़ा होता है। वैटिकन संभवतः उन सभी का समुच्चय था। यह पूरी तरह शांत और बंद पड़ा था।
चौबीस दिसंबर की रात को पोप ने वक्तव्य दिया, और अगले दो दिन गिरजाघर सहित वैटिकन बंद रहा। कोई रौनक, कोई मेला नहीं।
जब वैटिकन ही क्रिसमस पर इतना शांत है, फिर ख़ामख़ा क्यों दुनिया बाज़ार के जाल में फँस रही है? वह भी पूरब की ग़ैर-ईसाई दुनिया!
वैटिकन भले शांत था, मगर रोम में कुछ उत्सव थे। वहाँ के सुंदर फव्वारों के आस-पास सजे-धजे क्रिसमस पौधे और मेले लगे हुए थे। बच्चों के झूले, निशाने लगाने वाले खेल, बुढ़िया के बाल मिठाई आदि के ठेले लग गए थे। हालाँकि वहाँ भी क्रिसमस की रात सुनसान थी। अगली रात से भीड़भाड़ शुरू हुई।
आखिर मैं वैटिकन के गिरजाघर में दाखिल हुआ, जहाँ तक पहुँचने के लिए पूरे रोम के इतिहास से गुजरना था। हज़ारों मूर्तियाँ, पुराने बर्तन, कलाकृतियाँ जो रोम में खुदाई में मिलती गयी, वे वैटिकन में जमा होते गए। इसमें रोमन राजा, देवी-देवता, पुरानी उत्सव परंपरा सभी दिख जाती है। यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि क्रिसमस जैसे उत्सव भी मुख्यतः यूरोप के मूर्तिपूजक या पेगन परंपरा की उपज हैं। रोम की ईसाईयत इस परंपरा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पायी। उसे अपने गिरजाघर रोमन वास्तुकला से ही बनाने पड़े। उत्सव उन्हीं परंपराओं से उधार लेने पड़े।
गिरजाघर में प्रवेश पर यह स्पष्ट निर्देश थे कि बिना उचित कपड़ों के प्रवेश नहीं मिलेगा। महिलाओं की टाँगे और कंधे पूरी तरह ढके हों। स्लीवलेस कपड़ों और फटी जींस पर पाबंदी थी। अंदर शोर करने, तस्वीरें लेने पर पाबंदी थी। लगता है प्रगतिवादी दुनिया के उन्मुक्त स्वर इन दीवारों तक नहीं पहुँचे। पश्चिम के खुले समाज में इन तन ढकने वाले नियम को दक़ियानूसी क्यों नहीं कहा जाता? कहीं इसके पीछे भी इतिहास का बोझ तो नहीं?
इस गिरजाघर की वास्तुकला परतों में होने के कारण कुछ असमान दिखती है। माइकल एंजेलो के डिज़ाइन के बावजूद यह कमी रह गयी, क्योंकि उन्होंने नयी इमारत नींव से नहीं बनायी। रोमन भवनों से रिसाइकल किए गए पत्थर, और पुराने भवन पर नयी परतें चढ़ा कर बना सबसे महत्वपूर्ण गिरजाघर। इतिहास को अपने गोद में यूँ सँभाले हुए कि कुछ गिरने न पाए। माइकल एंजेलो की बनायी चित्रकलाएँ पाँच सदियों बाद भी इसकी छतों पर मौजूद है। इन फ्रेस्को भित्तिचित्रों में रोम बनने की कहानी भी है, और रोम के ईसाई बनने की भी।

यह भी एक विडंबना है कि मूर्तिपूजा का त्याग कर जो देवालय बने, वे मूर्तियों और चित्रकलाओं से सज गए। न सिर्फ़ यीशु मसीह बल्कि उनके तमाम अनुयायियों, मूसा और अन्य पैगंबरों, उनकी कथाओं-किंवदंतियों, बाइबल के चित्रणों से ये गिरजाघर पट गए। इससे अधिक सादे तो वीनस और जूपिटर के मंदिर थे जिन्हें पेगन कह कर तोड़ दिया गया।
गिरजाघर से निकल कर बाहर एक रेस्तराँ में बैठा तो वहाँ कुछ युवा पादरी जमा थे, जो फ़्रेंच भाषी थे। रेस्तराँ का एक इतालवी वेटर पूरे हाव-भाव से फ़्रेंच बोल रहा था, और बाकी उसके बहुभाषी होने पर रश्क कर रहे थे। ये नए पादरी थे जो अपनी डिग्री पूरी करने वैटिकन आए थे। यहाँ पोप का ठप्पा लगते ही वे कार्डिनल कहलाएँगे।
यीशु के दूत जिनके छोटे-छोटे कंधों पर दुनिया में ईसाईयत का भार है, वे मेरे समक्ष हरी सब्जियाँ और आलू खा रहे थे। उनकी मुस्कान में भौतिक चीजों से विरक्ति और पादरी पद पाने की खुशी का मिश्रण दिख रहा था। जब वे वापस लौट कर फ्रांस के किसी ग्रामीण गिरजाघर में खड़े होंगे, पूरा गाँव उन्हें आदर से देखेगा। उन्हें फादर कहेगा।
Author Praveen Jha writes a travelogue about Italy.

2 comments