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रोम की मूल बनावट साधारण है। यह शहर इटली के दक्षिण में समुद्र तट से कुछ दूर टाइबर नदी के दोनों तरफ़ बसा है। टाइबर नदी एक सर्पीली चाल वाली नदी है जिसकी चौड़ाई सौ मीटर से भी कम है। दिल्ली की यमुना या लखनऊ की गोमती से पतली। पुणे के मुला-मुथा नाले के बराबर।
रोम पहले मात्र एक पैलेटाइन पहाड़ी के ऊपर बसा था। यह पहाड़ी अब नगर के केंद्र में स्थित है, जहाँ प्राचीन रोम के कोलोसियम आदि हैं। धीरे-धीरे रोम आस-पास के कुल सात पहाड़ियों तक पसर गया। इन सभी पहाड़ियों को टीला कहना उचित होगा, क्योंकि इन्हें बड़े आराम से पैदल नापा जा सकता है।
रोम के किसी भी ऊँचे टीले से एक गुंबद देखा जा सकता है। यह गुंबद रोम नगर में होकर भी रोम में नहीं है। यह उसकी मात्र 49 हेक्टेयर के स्वतंत्र देश वैटिकन सिटी स्थित सेंट पीटर गिरजाघर का गुंबद है। यह पाँच सौ से भी कम जनसंख्या का देश इकलौता ऐसा देश है जो किसी नगर के अंदर स्थित है। यहाँ कैथोलिक धर्मगुरु यानी पोप रहते हैं।
इस ईसाई धर्म के सबसे बड़े चमचमाते गिरजाघर से लेकर रोमन इतिहास के मुख्य अवशेष कोलोसियम तक एक सीधी सड़क जाती है। यह सड़क कभी विशाल, भव्य और चौड़ी थी, जहाँ रोमन कुलीन वर्ग के लोग चला करते थे। यहाँ उस जमाने के शॉपिंग मॉल और व्यवसायिक केंद्र होते, जिन्हें फोरम कहा जाता। इसके दोनों तरफ़ स्विमिंग पूल वाले स्नानागार होते। अब इन सभी के सिर्फ़ भग्नावशेष बचे हैं। इस प्राचीन राजपथ के अधिकांश हिस्से अब इतने संकरे हैं कि कुछ हिस्सों में एक गाड़ी भी न गुजर पाए।
‘हमारे तानाशाह मुसोलिनी ने सोचा कि इसे फिर से चौड़ा किया जाए। जैसे प्राचीन गौरवशाली रोम में था। उन्होंने कई ऐतिहासिक इमारतें और गिरजाघर गिरा दिए’, मुझे एक मार्गदर्शक ने बताया
‘मैंने वे गिरी हुई इमारतें देखी। उन मलबों के ऊपर तो अब झाड़-जंगल उग आए हैं’
‘अगर मुसोलिनी की हार न होती, तो रोम वाकई बहुत ख़ूबसूरत हो जाता…’
यह बात जितनी सहजता से कही गयी, उससे रोम का बदलता राजनैतिक तेवर कुछ हद तक महसूस किया जा सकता है। उनकी नयी प्रधानमंत्री ज्योर्जिया मेलोनी उसी ‘ब्रदर्स ऑफ इटली’ की नेता हैं, जिसे मुसोलिनी के अनुयायियों ने शुरू किया था। इसे नव-फ़ासीवादी या घोर दक्षिणपंथी दल कहा जाता है।
मान लें कि मुसोलिनी जीत जाता। रोम की यह इमारतें गिरा कर चौड़ी आठ-दस लेन की चमचमाती सड़कें बना देता। तो क्या बुरा होता? क्या रक्खा है इन भग्नावशेषों और ऐतिहासिक इमारतों में? कुछ ऐसी ही सोच संजय गांधी की भी थी कि पुरानी दिल्ली नेस्तनाबूद कर एक आधुनिक नगर बसाया जाए। ऐसी सोच बहुत आकर्षक लगती है, लेकिन इससे शाश्वत चीजों का अंत भी तो होता है।
शाश्वत क्या है? कुछ नहीं।
टाइबर नदी के तट पर दो रोमन मंदिर हैं। ये मंदिर अब बंद हैं। इनके कोई उपासक नहीं। ये उन दिनों के मंदिर हैं जब रोम मूर्तिपूजक था। जब यीशु मसीह नहीं आए थे। ये ऐसे दो मंदिर भी हैं, जो भग्न नहीं हुए। लगभग ढाई हज़ार वर्षों से, तमाम आक्रमणों और गिरजाघर के कोप से बच गए। एक मंदिर त्रिकोणाकार और दूसरा वृत्ताकार है। दोनों का नामकरण भी हो चुका है, मगर स्पष्ट नहीं कि इनमें पूजा कैसे और किनकी होती थी। मैंने कभी देर तक उनकी परिक्रमा करते हुए यह जानने का प्रयास किया, मगर यह बंद दरवाज़े पर सर मारने जैसा था। लगा कि मंदिर तो उपासकों से ही बनता है। अगर उपासक न हों तो एक श्वेत संगमरमर का बना मंदिर भी कालकोठरी बन जाए।
इन दो मंदिरों की क़िस्मत अच्छी थी कि अपनी संपूर्णता में बची रह गयी। अन्यथा जूपिटर, अपोलो या वीनस आदि के मंदिर टूट गए, तोड़ दिए गए, या गिरजाघर में बदल दिए गए। अगर देखा जाए तो शायद उन मंदिरों की क़िस्मत बेहतर है, जो गिरजाघर बन गए। जैसे पैंथियन एक विशाल देवालय था, जो गिरजाघर बना लिया गया। वहाँ उपासकों की आवा-जाही तो चल रही है। मगर मामला इतना सुलझा हुआ नहीं है।
मंदिरों को तोड़ कर उनके पत्थरों और संगमरमर का प्रयोग गिरजाघर के लिए किया गया। न सिर्फ़ मंदिर बल्कि रोमन राजाओं के बनाए भव्य भवन भी तोड़ कर पूरे रोम में गिरजाघर बनाए गए। जो वैटिकन का सेंट पीटर गिरजाघर बना, वह कोलोसियम और रोमन मंदिरों को तोड़ कर जमा किए गए पत्थरों से बना। इस तरह उनके उपासक भले उसी रोम के वासी हैं, उन्हीं पत्थरों के बने देवालय में जा रहे हैं, मगर उनकी आस्था बदल चुकी है। एक तरह का मेटामोरफॉसिस या कायाकल्प।
जहाँ वीनस और रोमा के मंदिर थे, वहाँ ईसाई उत्सव हो रहे हैं। उन मंदिरों को पूरी तरह समतल नहीं किया गया। कुछ खंभे छोड़ दिए गए। यूँ ही टूटे-फूटे खंभे। कहीं न कहीं उन्हें यूँ छोड़ देना उन्हें समतल किए जाने से बेहतर दिखता है। इससे कम से कम यह कहावत तो चरितार्थ होती है-
रोम एक दिन में नहीं बना।
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Author Praveen Jha writes a travelogue on Italy.
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