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मैं नॉर्वे प्रवासी हूँ जहाँ घुड़सवारी और अन्य खेलों पर सट्टा वैध है। बाक़ायदा सरकार इसका संचालन कर अरबों रुपए कमाती है। पहाड़ी इलाका है, लोग कम हैं, तो ऐसे स्वप्नों की एक अदृश्य समानांतर दुनिया बनने लगती है। आज भी कुछ लोग दुनिया की हर घटना को एक गणितीय संयोग की तरह देखते हैं। भूकंप, भू-स्खलन, तूफ़ान से लेकर पारिवारिक विवाद भी एक संभावना है। खेल तो संभावनाओं का पिटारा है। इसका बहुआयामी उपयोग हम अर्थशास्त्र के ‘गेम थ्योरी’ में देखते हैं, जिस पर जॉन नैश जैसे जीनियस नॉबेल पुरस्कार पा चुके और उन पर बनी फ़िल्म ऑस्कर जीत गयी। मेघालय का अगला पड़ाव ऐसा ही एक संयोग था।
हम एक गाँव से गुजर रहे थे, जब देखा कि एक स्थान पर कई चारपहिया और दोपहिया वाहन लगे हैं, और कुछ ऊँचे सपाट घास की मैदान पर कई लोग उँकड़ू बैठे थे। मैंने पूछा कि यह कोई सभा या पंचायत लगी है?
मेरे गाड़ी चालक ने कहा, ‘ये तीर है। एक खेल है। बहुत लोग खेलता है इधर’
ग़ौर किया तो दूर कुछ तरकश भी दिखने लगे, हालाँकि धनुष नहीं नज़र आ रहे थे।
‘तीर-धनुष से निशाना लगाते हैं? अब तो शाम होने लगी है यह तो अच्छी धूप में खेलना चाहिए’
’अभी फर्स्ट राउंड फिनिश हो गया। सेकंड राउंड का वेट कर रहा है। पाँच मिनट में एक राउंड हो जाता है….वो हर राउंड का दो नंबर’
उसके बाद आधे घंटे तक वह कुछ समझाते रहे, और मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मुझे बस यह लगा कि यह ‘तीर’ कुछ उलझा हुआ खेल है, जिसे समझाने में भाषा धोखा दे रही है। उनकी हिंदी कुछ शब्दों तक ही सीमित थी और वह उत्साह में स्थानीय भाषा मिला रहे थे। मैंने इंटरनेट पर टाइप किया ‘शिलॉन्ग तीर’, देखा कि दर्जनों वेबसाइट और विडियो खुल गए। शिलॉन्ग तीर ऐप्प डाउनलोड करने के सुझाव आने लगे। लाखों रुपए जीतने के विज्ञापन दिखने लगे। वह शाम तो यह खेल समझने में ही बीत गयी।
खेल यूँ है कि मेघालय के चुनिंदा काबिल तीरंदाज़ शिलॉन्ग या किसी गाँव में जमा होते है। वे एक बीस-तीस मीटर दूर निशाने पर तीर चलाते हैं। पाँच मिनट के बाद गिनती होती है कि कितने तीर निशाने पर लगे। अगर हज़ार में से 868 तीर निशाने पर लगे, तो आखिरी दो अंक यानी 68 वह जादुई संख्या निर्धारित हुई। इसके बाद इसी तरह एक राउंड और होगा, और तीरंदाज़ों को दो सौ या पाँच सौ रुपए पकड़ा कर विदा कर दिया जाएगा। उनका काम खत्म, असल खेल तो बाकी मेघालय खेल रहा होता है।
शिलॉन्ग में जगह-जगह शिलॉन्ग तीर काउंटर बने हैं, जहाँ भीड़ लगी होती है। यह सट्टा है, जो उस तीरंदाज़ी के परिणाम पर लगता है। आप दोनों राउंड की जादुई संख्या चुनिए। पहली राउंड का तुक्का लगने पर आप अस्सीगुणा रकम जीतेंगे। दूसरी राउंड पर साठगुणा और दोनो राउंड पर चार हज़ार गुणा तक! हर दिन करोड़ों रुपए की बाज़ी लगती है, और हर शाम लोग उन दो जादुई अंकों की प्रतीक्षा करते हैं।
आप कहेंगे कि यह तो जुआ है। तुक्का लगाने का कोई तुक ही नहीं, जब यह एक रैंडम संभावना है। है तो जुआ और नशा ही, मगर यहीं एक तीसरे तत्व का प्रवेश होता है। मेघालय की परंपरा यह है कि इस तुक्के का निर्धारण उनके स्वप्न के आधार पर होगा। उन्होंने बीती रात जो सपना देखा, वह तय करेगा कि अंक क्या चुनना है।
सपने में हाथी या कछुआ आया तो 9 नंबर चुनें। कटहल दिखा तो 4 नंबर चुनें। पत्नी से विवाद दिखा तो 3 या 13 नंबर चुनें। इस तरह पूरी सूची है, जो आपके सपनों को आपकी किस्मत से, और आपके किस्मत को खेल से जोड़ती है। मैंने पिछली बार जब इसकी चर्चा की तो कुछ लोगों ने बताया कि यह एक हिंदी फ़िल्म का प्लॉट भी है।
प्रश्न यह है कि जब भारत के अधिकांश राज्यों ने किसी भी लॉटरी या सट्टे पर पाबंदी लगा रखी है, तब उत्तर पूर्व के छह राज्य क्यों इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा बना चुके हैं? क्या यह किसी अदृश्य समानांतर दुनिया, किसी अधूरे स्वप्न, किसी खगोलीय संभावना की तलाश है? मैंने लॉटरी के फेर में बर्बाद होते लोग देखे हैं, जब बिहार में यह आम था। मगर मेघालय वासी मानते हैं कि शिलॉन्ग तीर ने उन्हें आबाद ही किया है, और मेघालय सरकार इससे अच्छा-खासा राजस्व कमाती है।
ज़िंदगी का जुआ होना तो प्राकृतिक ही है। सिर्फ़ जुआ ज़िंदगी न बन जाए।
2
कुछ यात्राएँ कभी पूरी नहीं होती। तमाम योजनाएँ धरी की धरी रह जाती है। मेरे अनुभव में अक्सर रेकी और रिसर्च कर बनायी गयी यात्रा नहीं पूरी होती, और हम संयोग से भूले-भटके कहीं और पहुँच जाते हैं। जैसे बांग्लादेश सीमा पर एक स्थान वर्जित क्षेत्र में था, लेकिन मेरे पहुँचने से पहले ही भू-स्खलन के कारण मुख्य सड़क बाधित हो गयी। हमें सीमा सुरक्षा बल ने अपनी घेराबंदी से रास्ता दिया, और हम संयोगवश वर्जित क्षेत्र पहुँच गए।
वहीं एक पड़ाव ऐसा था जो मेरे मूल मिशन में था, किंतु उसमें बाधा ही बाधा उत्पन्न हो रही थी। पहले तो जिस जगह रुकने की बुकिंग की, वह कैंसल कर दी गयी। दो दिन बाद जाकर एक गेस्टहाउस में जगह मिली, तो हम चल पड़े। यह मेघालय का एक रहस्यमय जंगल है, जहाँ के लिए कहावत है,
“इस जंगल से एक पत्ता भी बाहर नहीं जा सकता”
अंधविश्वास है कि जिसने भी जंगल से कुछ भी बाहर ले जाने का प्रयास किया, उसे बाधा हुई, अनिष्ट हुआ या मर गया। सत्तर की दशक में एक बार भारतीय सेना ने उस जंगल में कुछ निर्माण-कार्य के लिए लकड़ी काटी, मगर उनका ट्रक वहीं जंगल में फँस गया। लकड़ी बाहर नहीं आ सकी।
मैंने अपने चालक से कहा, ‘मैं चुपचाप उस जंगल से एक लकड़ी उठा कर ले आना चाहता हूँ’
उन्होंने कहा, ‘वो गाइड ही लाने नहीं देगा। बहुत स्ट्रिक्ट है। अंदर उनका राजा रहता है’
‘कैसी बातें कर रहे हो? अब कहाँ कोई राजा बचे!’
‘वो सीक्रेट फॉरेस्ट है न। उधर रहता है’
‘सीक्रेट या सैक्रेड? मैंने तो सैक्रेड फॉरेस्ट पढ़ा है। यह देखो’, मैंने मोबाइल पर नाम दिखा कर कहा
’वही। हमको मालूम है। इधर बीस किलोमीटर आगे है। थोड़ा ट्रेकिंग करना होगा’
‘गेस्टहाउस से?’
’उसका लोकेशन किधर है, ठीक से मालूम नहीं। शायद दस किलोमीटर रहेगा’
सेक्रेड फॉरेस्ट या पवित्र वन एक साधारण जंगल दिखता है, जहाँ खासी योद्धाओं के वही स्मारक शिलाएँ मौजूद थे, जिनकी दर्जन भर तस्वीरें पहले से मेरे पास हैं। माना जाता है कि वहाँ उनके पुराने खासी राजा लबासा बसते हैं, जो उनके कुलदेवता भी हैं। अगर कोई भी इस जंगल को छेड़ने का प्रयास करता है, लबासा नाराज़ हो जाते हैं और उसके लिए बाधा उत्पन्न करते हैं। ज़ाहिर है मेरे विज्ञान-बोधी मन में ऐसे अंधविश्वास की जगह नहीं थी। कौन लबासा? कैसे लबासा?
जब हम मानचित्र देखते हुए आखिर गेस्टहाउस के पते पर पहुँचे, वहाँ सड़क से उतर कर एक ढलान नीचे की तरफ़ जा रही थी। नीचे एक दोमंजिला मकान था, जहाँ गाड़ी पहुँच नहीं सकती थी। बारिश की चिकनाई की वजह से उतरना कठिन हो रहा था। हम जैसे-तैसे नीचे पहुँचे। दो खासी युवतियाँ वह गेस्टहाउस सँभाल रही थी। वे सिर्फ़ टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोल रही थी, लेकिन उन्होंने सभी इंतज़ाम कर रखे थे। उनसे मैंने जंगल के विषय में पूछा तो बस ‘ओपेन ओपेन’ कहा, यानी जंगल खुला है।
जहाँ एक तरफ़ मैं उत्साहित था, वहीं मेरे परिवार की रुचि घटने लगी थी। चालक से खबर मिली कि बारिश की वजह से एक रास्ता बंद पड़ा है। जंगल की मिट्टी दलदली हो चुकी है। हम में से एक को घुटने की समस्या भी थी, और अंदर पत्थरों पर चिकनाई ज्यादा होने की संभावना थी। फ़िलहाल तो गेस्टहाउस से सड़क पर पहुँचना एक चैलेंज बन गया था, जंगल ट्रेक कौन करे? योजना बदल कर शिलॉन्ग से आगे कुछ फल, अचार आदि खरीदने और गुवाहाटी में अधिक समय बिताने का तय हुआ। मेरी चिर-निर्धारित योजना अपूर्ण रह गयी।
मैंने मज़ाक में कहा, ’लगता है यह लबासा की चाल है। वह नहीं चाहते कि मैं जंगल से लकड़ी उठा कर अपने ड्राइंग रूम में टांगूँ’
खैर, मेघालय के इस पवित्र वन में फिर कभी जाऊँगा। कुछ चुराने या सिद्ध करने के इरादे से नहीं जाऊँ, तो शायद लबासा स्वागत करें। हालाँकि मुझे रत्ती भर भी विश्वास नहीं कि ऐसे कोई देवता लबासा हैं।
अगर होते तो दुनिया के कई जंगल बच जाते।
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Author Praveen Jha writes a travelogue on Meghalaya, a beautiful state in North East part of India.
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