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जहाँ हिमालय और काराकोरम मिलते हैं, वहीं लद्दाख के बौद्ध और बाल्टिस्तान के मुसलमान भी मिलते हैं। उनकी भाषा, रहन-सहन, खान-पान, खेतीबाड़ी में कई समानताएँ हैं, वहीं उनके रंग-रूप, पहनावे, और आस्थाओं में अंतर भी स्पष्ट दिखते हैं।
‘ये बोगडांग के बाद से ही मुस्लिम एरिया शुरू हो जाता है, जो बॉर्डर तक जाता है। ये आगे गाँव सब पहले पाकिस्तान में था। जब वार हुआ, तो लद्दाख से आर्मी अंदर तक घुस गया। उसके बाद से वो इंडिया में आ गया’, गाड़ी चालक ने कहा
1971 में कर्नल चेवांग रिंचेन के नेतृत्व में लद्दाख स्काउट बाल्टिस्तान में घुस गयी थी। टुरटुक में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ़ युद्ध में शौर्य दिखाने के लिए उन्हें दूसरी बार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। जब सीज़फायर की घोषणा हुई, तो वहीं लाइन ऑफ़ कंट्रोल खींच दी गयी। नतीजतन टुरटुक और आस-पास के गाँव भारत में आ गए।
‘उस दिन जो जिधर थे, उधर ही रह गये। किसी के हस्बेंड काम पर गए, शाम को रास्ता बंद हो गया। किसी के भाई पाकिस्तान में रह गये। कई फैमिली इसी तरह बँट गयी’, टुरटुक गाँव में एक भोजनालय चला रहे मेरी उम्र के व्यक्ति ने कहा
मैंने सोचा कि पहले सीमा देख ली जाए, फिर तसल्ली से गाँव में समय बिताऊँगा। एलओसी टुरटुक से ढाई किलोमीटर उत्तर में था। टुरटुक चौकी से एलओसी तक जाने की इजाज़त सिर्फ़ भारतीय नागरिकों को थी। वहाँ सभी के पासपोर्ट चेक हो रहे थे। वह प्रक्रिया पूरी कर हम भारत के सबसे उत्तरी बिंदु पर पहुँच गए जो थांग गाँव में था।
वहाँ एक मुसलमान बुजुर्ग दूरबीन लगा कर बीस रुपए में नदी के उस पार पाकिस्तान दिखा रहे थे। उन्होंने दिखाया कि एक कटीली बाड़ है, जिसके आगे घाटी में एक गाँव बसा है- फिरनी। एक बोर्ड पर लिखा था,
‘थांग गाँव (भारत) और फिरनी गाँव (पाकिस्तान) 1971 से पहले जुड़वाँ गाँवों की तरह थे। अचानक 16 दिसंबर 1971 की रात को इन गाँवों के बीच LOC खिंच गयी, और ये हमेशा के लिए अलग हो गए। आज ऐसे पति मिलेंगे जिनकी पत्नी उस पार रह गयी, उस समय के बच्चे मिलेंगे जिनके माता-पिता उस पार रह गए। वे अपने परिजनों को दूर खेतों में काम करते देखते हैं, मगर मिल नहीं पाते। यह विभाजन की कहानी है, जो यहाँ सच है’
वहीं एक छोटा सा तंबू लगा था, जिस पर कलम से लिखा था- Museum 10 Rs. मैंने अंदर झाँका तो कोई नहीं था, यूँ ही कुछ तस्वीरें पड़ी थी। दस रुपए मांगने वाला मिलता तो शायद यही बताता कि ये तस्वीरें उस पार के परिजनों की है।
लद्दाख और बाल्टिस्तान किसी समय स्वतंत्र अस्तित्व में भी थे। वहाँ के अपने राजा हुआ करते थे। लद्दाख में नांगयालों का राज था, और बाल्टिस्तान में याग्गो (Yagbo) परिवार का। उन्नीसवीं सदी में कश्मीर के डोगरा राजा गुलाब सिंह ने अपने सेनापति जोरावर सिंह को इन दोनों पर कब्जा करने भेजा। लगभग एक ही समय बाल्टिस्तान और लद्दाख कश्मीर का हिस्सा बन गए। वहाँ के राजाओं को कश्मीर का जागीरदार बना दिया गया। आज भी ये परिवार मौजूद हैं। नांगयाल परिवार लेह के निकट स्टोक गाँव में रहते हैं और याग्गो परिवार से तो मैं मिलने जा ही रहा था।
जब 1948 में सीमा खिंची गयी, उसमें बाल्टिस्तान पाकिस्तान के हिस्से चला गया। हालाँकि भारत पूरे कश्मीर (गिलगिट-बाल्टिस्तान सहित) पर अपना दावा करती रही है किंतु अब तक स्थिति यही है। भारत ने 1971 में कई कब्जा किए गए सीमावर्ती गाँव लौटा दिए, लेकिन टुरटुक नहीं लौटाया। इसकी रणनीतिक वजह थी। टुरटुक और शेष बाल्टिस्तान के मध्य शायोक नदी बहती है। भारत के लिए यह गाँव बहुत महत्वपूर्ण था ताकि नदी का एक तट अपने हाथ में रहे।
मुझे उम्मीद थी कि इस गाँव का माहौल बहुत ही तनावपूर्ण होगा। लेकिन, ऐसा लगता है कि भारत ने इस गाँव को काफ़ी हद तक अपना बना लिया है। यहाँ लड़कियाँ खेतों के रास्ते स्कूल जाते दिख रही थी। स्कूल का नाम था ‘आर्मी गुडविल स्कूल’ जो संभवतः भारतीय सेना के देख-रेख में है। शायोक नदी के किनारे गेहूँ की छँटाई चल रही थी। वहाँ भी सिर्फ़ स्त्रियाँ। हमारी गाड़ी के सामने दो गोरी-चिट्टी युवतियाँ पुआल जमा कर उसकी गठरियाँ बना रही थी।
मैंने अपने चालक से कहा, ‘यहाँ तो लड़कियाँ बहुत खुश लग रही है। सभी काम कर रही हैं’
‘क्या बात करता है सरजी? मुसलमान लड़की लोग बोलता है – किधर भी शादी कर दो, कश्मीर भेज दो, कारगिल भेज दो, मगर टुरटुक मत भेजो। इधर औरत लोग जानवर जैसा काम करता है, और मर्द लोग खाली बैठा रहता है’
कुछ ही देर बाद मैं एक मकान में था, जिस पर बोर्ड लगा था- वीमेन वेलफेयर सोसाइटी
’आइए भैया! आप आइए। हमलोग बाद में भी खा लेंगे।’
मैं जब वीमेन वेलफेयर सोसाइटी में पहुँचा, तो चार-पाँच महिलाएँ बैठ कर गेहूं की मोटी रोटी और कुछ जंगली साग जैसी सब्जी खा रही थी। उन्होंने एक पुराने घर को संरक्षित कर बाल्टी संस्कृति दिखाने के लिए रखा था। यह लकड़ी का बना घर ऐसी हालत में था कि मेरे पीछे आए कुछ लोग पचास रुपए की टिकट सुन कर ही लौट गए। टूटे घर और फूटे बर्तन के पचास रुपए कौन दे?
मेरे लिए भी प्रवेश दरवाजा बहुत ही छोटा था, जिसमें जैसे-तैसे सर झुका कर अंदर घुसा। जो युवती मुझे इतिहास समझा रही थी, उनको मैंने पूछा, ‘इस घर के असली मालिक कहाँ हैं? पाकिस्तान में?’
‘यह तो मालूम नहीं। वीमेन वेलफेयर सोसाइटी इसका देखभाल करती है। 1999 से पहले तो पाकिस्तान में ही होगा’
मैंने कहा, ‘1999 नहीं, 1971. आप कारगिल युद्ध की बात कर रही हैं। गाँव तो 71 से ही भारत में है’
उन्होंने कहा, ‘सॉरी सॉरी। 1971’
यह बातचीत सुन कर एक अधेड़ महिला अंदर दाखिल हुई और कहा, ‘यह मेरी बेटी है। अभी इसको ठीक से हिस्ट्री याद नहीं हुआ। मैं दिखाती हूँ घर…यह कहवा और चाय बनाने का केतली है, जो पुराने लोग रखते थे। यह चमड़े का पोटली है, जिसमें पानी भर कर ले जाते थे…यह ठंड में बच्चों को सुलाने की जगह। सूखे घास का बेड बनाते थे, ऐसे…’
मैंने पूछा, ‘मगर यह घर है किसका? कहाँ रहते हैं?’
‘श्रीनगर में रहते हैं। अभी तो सबका पक्का मकान बन गया भैया। ऐसे घर में कौन रहेगा? गाँव में बस यही पुराना घर बचा है, तो हमने इसको अपने घर से बर्तन और पुरानी चीजें लाकर म्यूज़ियम बना दिया’
‘आपलोग यहाँ खुश हैं?’
यह प्रश्न बहुआयामी था। पाकिस्तान छोड़ कर भारत में खुश हैं या नहीं? टुरटुक में महिला जीवन में खुश हैं? सेना संरक्षण में रह कर खुश हैं? सीमावर्ती युद्ध ज़ोन में रह कर खुश हैं?
‘हाँ। अभी क्या हो गया भैया, हमलोग इंडिया के आखिरी गाँव है। पहले बोगडांग था, अभी हम हो गए। (हँस कर) बोगडांग वाले गुस्सा होते हैं कि उनसे ज्यादा हमलोगों को अभी सब मानते हैं। आप टूरिस्ट लोग आते हैं, आर्मी भी हेल्प करता है। हमलोगों का सोसाइटी सभी लड़की को पढ़ने कहता है। यहाँ एक लड़की डॉक्टर बनी, अभी एक पढ़ाई कर रही है’
‘आपका पासपोर्ट, आधार कार्ड?’
‘सब है न भैया। अभी हमलोग इंडियन है न? हमारी बेटी तो यहीं पैदा हुई’
‘मैंने बोर्ड देखा कि यहाँ कोई रॉयल पैलेस है। यहाँ राजा थे क्या?’
‘अभी भी हैं। यहाँ से सौ कदम चलने से मिल जाएँगे’
‘इस रास्ते बाल्टिस्तान के राजा मिलेंगे?’, मैंने उस संकरी पगडंडी को देख कर कहा, जिसके दोनों तरफ़ घर बने थे
‘हाँ। राजा भी है, फैमिली भी है’
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संभवतः यह दुनिया का सबसे बर्बाद रॉयल पैलेस था, जिसके दरवाजे तक पहुँचने के लिए मुझे पैदल ही संकरी पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ा। वहीं दूसरी तरफ़ यह एक आबाद रॉयल पैलेस था, जिसका दरवाजा खोलने वाले स्वयं युवराज थे। अंदर राजकुमारी बरामदे पर बैठी थी, और ऊपर दीवानखाने में बैठे थे- याग्गो (राजा) मोहम्मद ख़ान काचो।
उनके पुत्र की उम्र 24 वर्ष थी, और वही मुझे जगह दिखाने लगे, ‘यह दरअसल समर पैलेस था, जहाँ गर्मियों में याग्गो राजा आया करते थे…हमने उस जमाने के बर्तन संभाल कर रखे हैं। आप इस पर बने आर्ट देख कर बताइए कि यह किस स्टाइल के लगते हैं’
‘पर्शियन ही लगते हैं’
‘दैट्स लिटिल ट्रिकी…जैसे यह टिपिकल पर्शियन है, लेकिन यहाँ तिब्बतन सिंबॉल है। यह जो बाज़ (eagle) दिख रहा है, यह तुर्कीस्तान से हमारे फैमिली में आया है…अब यह पीतल का बर्तन देखिये। इसमें नौ शेप है। इससे शिव भगवान पर दूध डालते थे, जब वहाँ हिंदुइज्म था…’
‘रुद्राभिषेक में पंचामृत डालते हैं। बाल्टिस्तान में भी?’
‘नहीं। इस्लाम आने के बाद जो हिंदू और बुद्धिस्ट सिम्बॉल है, वह कम हो गए, मगर इस फॉर्म में रह गए’

वह अंग्रेज़ी-हिंदी मिला कर काफ़ी सधी भाषा में अपनी बात रख रहे थे। उम्र के हिसाब से इतिहास-बोध भी अच्छा था। हालाँकि उनके ज्ञान के मुख्य स्रोत तो ऊपर दीवानखाने में कहवा पीते मिले।
मैं जब उनके पास पहुँचा, वह गद्देदार कुर्सी पर बैठे कुछ मराठी टूरिस्ट से बात कर रहे थे, ‘आप लोग तो बाल ठाकरे साहब के इलाके से हैं। न्यूज़ में कुछ पोलिटिकल टशल देख रहा था। अभी सब ठीक हो गया?’
‘हमारे ख़ानदान की शुरुआत तो आज के ताजिकिस्तान से हुई। वहाँ खागन्ज़ (Khagans) होते थे, जो बाद में ख़ान कहलाने लगे। हमारी फैमिली का सरनेम था – याग्गो (Yagbo)…आप जो ये फैमिली ट्री देख रहे हैं, उसमें ऊपर के बारह ताज़िकिस्तान में थे। उसके बाद हम बाल्टिस्तान आए’, याग्गो राजा मोहम्मद ख़ान ने आगे कहा
‘यह जो आपके पैलेस के दरवाज़े पर बाज़ बना है, उस पर भी ताजिकिस्तान की छाप दिखती है। मैंने सुना है कि वहाँ के लोगों को बाज़ पालने का शौक होता है’, मैंने कहा
‘इट्स जस्ट अ सिम्बॉल’, उन्होंने मेरी बात को ख़ास महत्व न देते हुए कहा
‘आपके परिवार के अन्य लोग पाकिस्तान के बाल्टिस्तान में होंगे?’
‘हाँ! मेरे कज़िन्स हैं’
‘आप लोग उर्दू में बात करते हैं?’
‘नहीं। हमारी बाल्टी लैंग्वेज है। इट्स क्लोज टू तिबतन (Tibetan)’
मैं वहीं दीवानख़ाने में टहल कर पुराने तलवार और बंदूकें देखने लगा। बाहर बाल्कनी से काराकोरम के रुखे पहाड़ दिख रहे थे।
‘ऊपर क्वीन बैठती थी, नीचे किंग बैठ कर पब्लिक से बात करते थे’, उनके बेटे ने कहा
‘आपका मतलब है कि जनता के मामलों में रानी भी राजा के साथ विमर्श करती थी?’
‘यस! एग्जैटली’
यह बात उस छवि से मेल नहीं खाती थी, जो अन्य बाल्टी स्त्रियों के विषय में बन रही थी। लेकिन, मुमकिन है यह बदलाव बाद में आया हो। कबीलों में रानी का अलग महत्व रहा हो।
मैं जब आंगन की मुंडेर की तरफ़ बढ़ा तो एक जगह ठिठक गया। वहाँ छत पर स्वास्तिक का चिह्न बना था।
मैंने अंदर जाकर पूछा, ‘यह आपकी छत पर स्वास्तिक का चिह्न?’
‘ये हमारे आर्किटेक्चर में कॉमन है। बहुत जगह मिलेंगे’
‘क्या इसलिए कि बाल्टिस्तान पर पहले हिंदू प्रभाव था?’
‘दैट्स अ गुड पॉसिबिलिटी। हिंदू, पर्शियन, ताज़िक और बुद्धिस्ट इंफ्लुएंस तो है ही…लेकिन 18वीं सेंचुरी में हमारे एक एन्सेस्टर थे याग्गो रहीम ख़ान। उन्होंने अभी जो हिमाचल है, वहाँ की एक हिंदू प्रिंशेस से शादी की थी। उनका ब्लड हमारे अंदर भी है’
‘आपको लगता है कि यह स्वास्तिक उनके समय में बना?’
‘हाँ। उनको हमारा फैमिली बहुत रेस्पेक्ट करती है…उस ज़माने में रॉयल फ़ैमिली में इतना हिंदू-मुस्लिम नहीं था। बस रॉयल ब्लड होना चाहिए। कई झगड़े-लड़ाई इसी तरह खत्म हो जाते थे’

‘लेकिन अब तो डेमोक्रेसी है’, मैंने कहा
‘अच्छा है। द सिस्टम शूड वर्क। दिस वे ऑर दैट वे’
मैंने उनको अलविदा कहा, और इस बात पर मनन करने लगा कि लोकतंत्र अच्छी चीज है, जिसमें मैं या कोई भी किसी रजवाड़े ख़ानदान के व्यक्ति से खुल कर बतिया सका। यह भी लगा कि वह टुरटुक छोड़ कर अपने भाइयों के साथ पाकिस्तान में रह सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी। उनके परिवार ने भारत में अपने पैतृक गाँव में ही रहना चुना।
जब वहाँ से लौटने लगा, तो शायोक नदी को देख कर अपने चालक से पूछा, ‘यहाँ मछली मारते लोग नहीं दिखते’
‘इधर लद्दाख में कोई नहीं मिलेगा सरजी। हमलोग बुद्धिस्ट है न’
‘लेकिन आपलोग माँस तो खूब खाते हैं?’, मैंने पूछा
‘खाता है, लेकिन मारता बहुत कम है। बाकी जानवर का तो ज़ुबान होता है। मछली का तो ज़ुबान भी नहीं होता। इसलिए नहीं मारता। हमलोग टिन में जो मछली बिकता है, वह खाता है’
मुझे यह बात अटपटी लगी, लेकिन वाकई सड़कों पर देखा कि टिनबंद टुना मछली धड़ल्ले बिक रही है। जबकि यही लोग सिंधु, जांस्कार, शायोक, नुब्रा नदियों से मछली मार सकते हैं। वहीं बौद्ध और मुसलमानों के मध्य एक और परस्पर निर्भरता दिखने लगी। मुर्गियाँ और भेड़ आदि के माँस मुसलमान काटते, और मटन मोमो बना कर खाते बौद्ध।
‘हमलोगों को अब स्वाद लग गया सरजी। ठंडा जगह है। सब्जी पहले बहुत कम होता था, तो लोग खाने लग गया’, चालक ने कहा
‘हाँ। प्रोटीन तो ज़रूरी है। लेकिन, जो पक्के बौद्ध होंगे, वे क्या खाते होंगे?’
‘फल खाता है। सत्तू खाता है’
‘सत्तू?’

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In part 6 of series on Ladakh travel, Author Praveen Jha describes Turtuk village which was taken from Pakistan in 1971. He also meets last royal family from Baltistan.