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‘लद्दाख न मेघालय है, न उत्तराखंड, न नॉर्वे। पहाड़ी जीवन बिताने के बाद भी लद्दाख के लिए अलग तैयारी चाहिए। पिछले ही महीने छह पर्यटकों को बीच रास्ते वापस जाना पड़ा। यह ठीक है कि हज़ारों लोग आते हैं, बड़े आराम से घूम कर जाते हैं, मगर लद्दाख के अपने प्राकृतिक नियम हैं। कहावत है-
Don’t be a Gama
In the Land of Lama
मिस्टर दोरजी ने कहा
यही कहावत मेरे एक यायावर प्रवृत्ति के मित्र ने चार दिन पहले कही जब मैंने कहा मेघालय से निकला हूँ, लद्दाख जा रहा हूँ। कुछ छप्पनइंची गामा भी मिले, जिन्होंने कहा,
‘अरे, कुछ नहीं है! मैं तो तीन बार मोटरसाइकिल दौड़ा चुका हूँ। पूरा सर्किट नाप चुका हूँ। बाल बाँका न हुआ’
इतनी डॉक्टरी तो पढ़ी है कि यह इल्म हो समुद्र तल से साढ़े तीन हज़ार मीटर ऊँचाई पर जाकर ऑक्सीजन की स्थिति कैसे-कैसे बदलती है। मोटरसाइकिल से जाने से क्या होता है, सीधे हवाई जहाज से पहुँचने से क्या होता है। बिना कोई तीसमार ख़ान बने मैंने एसिटाजोलामाइड टैबलेट तीन दिन पहले से लेनी शुरू कर दी थी।
उन्होंने आगे कहा,
‘एक बार योगगुरु बाबा रामदेव यहाँ आए और कहा कि नित प्राणायाम करते हैं, योगी हैं, उन्हें भला क्या ऑक्सीजन की कमी होगी। यहाँ पहुँचते ही उनका ऑक्सीजन लेवल गिर गया। उन्होंने थोड़ी देर वहीं के वहीं प्राणायाम कर कहा- ‘अब चेक करिए’….लेकिन ऐसे कैसे इतनी जल्दी एक्लेमाइटेजेशन होता! ऑक्सीजन ज्यों का त्यों रहा।
उन्हें समझाया गया कि बाबाजी! आप थोड़ा समय लें, यहाँ के वातावरण में जम जाएँ, तभी आगे की यात्रा करें। उन्होंने चिकित्सकों की बात मानी। समय लगा कर एडजस्ट हुए। बाद में वह खारदुंगला टॉप पर भी योग करने गए’
मैंने कहा, ‘मैं तो उड़ कर दिल्ली से आया हूँ, और बाबा रामदेव भी नहीं हूँ’
‘फिर तो आप जानते ही हैं। दिल्ली की सबसे ऊँची जगह है पार्थसारथी रॉक, जहाँ से मैंने पढ़ाई की’
‘जो जे एन यू में है?’
‘हाँ। मगर उसकी ऊँचाई लद्दाख के मुक़ाबले कुछ नहीं’
‘मैं समझ गया मगर आपने जेएनयू से पढ़ाई की है?’, मैंने बात का रुख़ बदलते हुए कहा
‘हाँ! इसमें चौंकने की क्या बात है? मैंने एमए, एम फिल, पीएचडी सब कुछ किया है। लद्दाख में मेरे जैसे कई लोग हैं। आपको क्या लगता है कि लद्दाख के लोग कम पढ़े-लिखे होंगे?’, उन्होंने हँस कर कहा
’नहीं नहीं। ऐसी बात नहीं। मेरी पढ़ाकू डाक्टर दोस्त ने आपके साथ शादी की है, तो यह अंदाज़ा तो था कि यहाँ के लोग पढ़े-लिखे होंगे। मगर लद्दाख के विषय में शंकाएँ तो कई हैं’
‘हाँ! जैसे आपने सुना हो कि लद्दाख में घास भी नहीं उगती’
‘ऐसा तो पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू ने कहा था’, मैंने एक संसदीय वक्तव्य याद करते हुए कहा
’कई बुद्धिजीवियों ने अपने लेखों में लिखा है कि सत्तर प्रतिशत से अधिक इलाके वनस्पतिहीन हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या उन्होंने वाकई सत्तर प्रतिशत लद्दाख घूम कर वनस्पतियों का अध्ययन किया है? उन्हें अंदाज़ा भी है कि चीन के हड़पने के बाद भी लद्दाख कितना विशाल है? हवाई जहाज से आपको वनस्पति नज़र नहीं आएगी। यहाँ की भेड़, यहाँ के तेंदुए, इतने कम ऑक्सीजन में रेत खाकर ज़िंदा नहीं रहते। लद्दाख के बंजर दिखते लैंडस्केप में वनस्पति ही वनस्पति है!’
’समझ गया। वे बुद्धिजीवी भी खामखा दिल्ली में बैठे गामा हुए जा रहे हैं। उन्हें लद्दाख को समझने के लिए लामा बनने की ज़रूरत है’, मैंने हँस कर कहा
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हम अक्सर अपने-अपने क्षेत्रों और अस्मिता के प्रति रक्षात्मक या आक्रामक हो जाते हैं, ख़ास कर जब किसी दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति आरोप लगा रहा हो। लद्दाख के लोग भी बुरा मान जाते हैं जब कोई कहता है घास नहीं उगती। लेह के मुख्य बाज़ार में कुछ जंगली बौने कद के पौधे लद्दाखी, अंग्रेज़ी और वैज्ञानिक नाम पट्टिका सहित लगा रखे हैं, कि देख लो! घास तो उगती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि मेघालय और हिमाचल के घने जंगलों से लदे पहाड़ों के बनिस्बत लद्दाख में वनस्पति पहली नज़र में कम दिखती है। यहाँ हिमालय नग्न और रुखे रूप में दिखता है। यहाँ के पर्वतों के नाम और महिमा भी अपेक्षाकृत कम है। यह संभव है कि अगर यह अंतरराष्ट्रीय संवेदनशील सीमा न होती, तो यहाँ सड़क और संसाधन कम पहुँचते।
‘सड़कें आज भी लद्दाख के विस्तार से हिसाब से बहुत कम है। आप पर्यटक एक ख़ास रूट से गुजर कर निकल जाते हैं, और लिख देते हैं कि सड़क अच्छी है। सीमा क्षेत्रों में फौज के आवा-जाही के लिए सड़कें हैं, लेकिन चीनी हिस्से के मुकाबले कम है। भारतीय रूट के दोनों तरफ़ जो असल लद्दाख है, वहाँ दूर-दूर तक सड़कें नहीं है। आज भी वहाँ गरीबी है, कोई संसाधन नहीं, मीलों चल कर पानी लाना पड़ता है’, उन्होंने कहा
‘अब यह केंद्र शासित प्रदेश (Union territory) बन गया, तो कुछ उम्मीद दिखती है?’
‘हाँ! उम्मीद तो दिखती है। हम यहाँ विश्वविद्यालय, केंद्रीय अस्पताल, स्कूलों, सरकारी नौकरियों और ग्राम सड़कों की उम्मीद लगाए बैठे हैं’
मैंने शाम को ग़ौर किया कि दुकानों के बोर्ड पर Laddakh UT लिख दिया गया था। ज़ाहिर है ये बोर्ड जम्मू-कश्मीर मिटा कर नए सिरे से लिखे गए होंगे। कुछ सरकारी पट्टिकाओं पर मुफ़्ती मोहम्मद सईद आदि द्वारा उद्घाटन के विवरण थे, मगर लगा कि लद्दाख ने कश्मीर से अलग अपनी राजनैतिक मुहर लगानी शुरू कर दी है।
मैंने पूछा, ’यह तो आप मानेंगे कि किसी भी सरकार के लिए लद्दाख जैसे दुर्गम स्थान को सुगम बनाना कठिन है। वनस्पति है, मगर अन्य क्षेत्रों जैसे कश्मीर, हिमाचल, उत्तर-पूर्व की अपेक्षा बहुत कम है। फल-सब्जियाँ, खेत बहुत कम हैं। आप भी कई चीजें बाहर से मंगाते हैं’
‘हाँ! दुर्गम तो है ही। बल्कि दुनिया के सबसे दुर्गम इलाकों में है। यहाँ ठंड के समय जहाँ तापमान -35 डिग्री तक जाता है, वहीं सूर्य की तपिश भी कायम रहती है। हम अक्सर विदेशियों को समझाते हैं कि हाथ-पाँव अच्छी तरह ढक कर रखिए, अन्यथा एक तरफ़ सनबर्न और दूसरी तरफ़ फ्रोस्ट-बाइट हो जाएगा’
’यह तो वाकई अजूबी बात है कि एक साथ सूरज की किरणों से बदन जल जाए, और ठंड से बदन गल जाए!’
‘हाँ! लेकिन यह दुर्गमता ही हमारा एक्स-फैक्टर भी है। लोग यहाँ दुनिया का चरम देखने ही तो आते हैं। सबसे बड़ी बात कि यह भारत का उतना ही महत्वपूर्ण अंग है, जितना दूसरा अंग। इसकी दुर्गमता के कारण भारत सदियों से सुरक्षित भी रहा है।
आप घर के अंदर चाहे कितने भी रंग-रोगन कर लें, मगर दीवारों की कद्र न करेंगे तो क्या घर बचेगा?’
‘दीवारों की कद्र तो हो ही रही है। यहाँ सेना पर अच्छा निवेश है। सड़कें बेहतर बन रही है। मगर आप यह बताएँ कि एक आम भारतीय पर्यटन से इतर यहाँ क्यों आए? यहाँ है क्या?’
उन्होंने मेरे तीखे बेरुखे सवाल पर व्यंग्यात्मक मुस्कान से कहा, ‘आप बाज़ार घूम लीजिए। लद्दाख देख लीजिए। लोगों से पूछिए कि वे यहाँ क्यों काम करने आते हैं। क्यों इसे कोई छोटा दुबई तो कोई स्विट्ज़रलैंड कहता है’
मैं शाम को लेह के मुख्य बाज़ार के मुहाने पर कांग्रेस पार्टी के ऑफिस के आस-पास टहल रहा था, तो एक गोलगप्पे का ठेला दिखा। मुझे कुछ अटपटा लगा कि भाई! लेह में गोलगप्पे!
एक प्लेट खाते हुए पूछा, ‘बाहरी लगते हैं आप। कहाँ से हैं?’
उन्होंने कहा, ‘बिहार से’
’अच्छा? मैं भी दरभंगा से हूँ’
‘भागलपुर-बाँका जानते हैं?’
‘हाँ हाँ! छुटपन में चार बार काँवर लेकर गया। मगर आप लद्दाख कैसे पहुँच गए? कमाई ज्यादा है? यहाँ मन लगता है?’
’मन लगता है, तभी तो हैं। हमलोगों का कमाई तो यहाँ दिल्ली-बंबई से तीनगुना है’
‘हाँ! मैंने भी सुना कि यहाँ की कमाई दुबई जैसी है’, मैंने प्रवाह में बुर्ज ख़लीफ़ा की तुलना गोलगप्पे के ठेले से कर दी।
उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, ‘आपका एक प्लेट हो गया। और एक प्लेट लीजिएगा?’
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Author Praveen Jha writes his travel diary on Ladakh.
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